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गर्भवती महिला अदालत में पेश होने को बाध्य नहीं

दिल्ली की अदालत ने कहा है कि यदि कोई महिला गर्भावस्था के शुरुआती चरण में है तो उसे अदालत में पेश होने पर बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह फैसला एक गर्भवती महिला के पक्ष में सुनाया जिसके खिलाफ एक निचली अदालत ने गैर जमानती वारंट जारी किया था। महिला पर आरोप था कि वह दहेज प्रताड़ना के एक मामले में अदालत में पेश नहीं हो रहीं ।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आरके गॉबा ने निचली अदालत के इस रूख पर नाखुशी जाहिर की कि उसने आपराधिक मामले में व्यक्तिगत तौर पर पेश होने से गर्भवती महिला को छूट नहीं दी। अदालत ने निचली अदालत की उस बात पर भी आपत्ति जताई जिसमें महिला से कहा गया था कि या तो वह अदालत के सामने पेश हो अथवा आरोप स्वीकार कर ले।

न्यायाधीश गॉबा ने कहा कानून अदालत को आदेश में संकेत में भी शर्त रखने की इजाजत नहीं देता। आरोपी की पेशी के लिए कानून की जरूरत सिर्फ अपवादों के लिए है जिसमें शारीरिक असंभाव्यता भी शामिल है। अदालत ने कहा (पेशी की) यह आवश्यकता आरोपी की बांह मरोड़ने या उसके वकील की ओर से आरोप को स्वीकार कर लिए जाने के रूप में इस्तेमाल नहीं की जा सकती। मैं प्रयोग की भाषा को सही नहीं मानता।

दहेज प्रताड़ना के एक मामले में आरोपित 25 साल की मीनाक्षी को राहत देते हुए न्यायाधीश ने निचली अदालत के आदेश को दरकिनार कर उसे अदालत में व्यक्तिगत तौर पर पेश होने से छूट दे दी।

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  • Web Title:गर्भवती महिला अदालत में पेश होने को बाध्य नहीं