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फिर इतिहास रचेगा नालंदा

नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना की दिशा में बढ़ाया गया कदम एक ऐतिहासिक फैसला है। एक तरह से यह एशिया के पुनर्जागरण जैसा है। जाहिर है, नालंदा विश्वविद्यालय विधेयक-2010 संसद से पारित हो चुका है। एशिया के 16 देशों ने इसके लिए वित्तीय सहायता की मंजूरी दी है। पांचवीं से बारहवीं सदी तक ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर से ज्ञान के सागर में गोते लगाने के लिए पूरी दुनिया को बुला रहा है। बिहार सरकार ने राजगीर में 477 एकड़ जमीन इस विश्वविद्यालय के लिए केंद्र सरकार को सौंप दी है। इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रशंसा के पात्र हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन को विश्वविद्यालय के लिए गठित मेंटर ग्रुप का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। निश्चित रूप से इस विश्वविद्यालय की स्थापना से ज्ञान रूपी गंगा की अवरिल धारा बहेगी और भारत एक बार फिर से जगतगुरु की भूमिका निभाएगा।
नीतीश कुमार निशांत, जामिया हमदर्द, दिल्ली

मौन क्यों हैं मसीहा?
कृषि प्रधान होते हुए भी जिस देश की आधी से अधिक आबादी रात को भूखी सोती हो, जिस देश का भविष्य (बच्चे) कुपोषण से ग्रसित हो, वहां लाखों टन अनाज इस प्रकार सड़ा दिया जाए कि वह किसी का निवाला न बन सके, तो यह यकीनन सरकार की आपराधिक लापरवाही है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 12 अगस्त को दिए गए ऐतिहासिक आदेश के बाद भी कृषि मंत्री शरद पवार की नींद नहीं खुली। यह मंत्री की संवेदनहीनता नहीं, तो और क्या है? सरकार कुछ अच्छा करती है, तो सभी निगाहें 10 जनपथ व सात-रेसकोर्स की तरफ उठ जाती हैं। कांग्रेसी सोनिया गांधी का गुणगान शुरू कर देते हैं, परंतु अब जब करोड़ों गरीबों का न जाने कितने दिनों का निवाला बर्बाद कर दिया गया है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? आखिर चुप क्यों हैं, आम आदमी के भाग्यविधाता?
मनोज शर्मा, जी-447, श्रीनिवासपुरी, नई दिल्ली

खेल-खेल में खेल
खेल-खेल में हुआ भारत संग क्या खेल
लूटें, खाएं लोग कुछ, करते रेलम पेल
करते रेलम पेल, शर्म न इनको आती
बेईमानी, घपलेबाजी ही है इनको भाती
खुली लूट है मची और सरकार देख रही
होने दो बस खेल, अभी तो यही सही।
मामनचंद गोतान, ए 44, हंस अपार्टमेंट्स, ईस्ट अर्जुन नगर, दिल्ली

परमाणु ऊर्जा किसके लिए?
देश में परमाणु दायित्व विधेयक पर खूब हंगामा हुआ, पर ऊर्जा के लिए एक स्रोत के रूप में इसे अपनाते समय क्या उसके काले पक्ष को ध्यान में रखा गया? वर्ष 1986 में भूतपूर्व सोवियत संघ के चेर्नोबिल परमाणु बिजली घर में खराबी पैदा हुई थी, जिसके कारण उसके रिएक्टर में आग लगी और अनेक विस्फोट हुए। उस नाभिकीय दुर्घटना की रेडियोधर्मिता से लगभग 6.5 लाख लोगों के गंभीर रूप से प्रभावित होने का अनुमान है। भोपाल गैस त्रासदी की पीड़ा हम अब भी भुगत रहे हैं। आज भी भोपाल में मानसिक और शारीरिक रूप से विकृत बच्चों जन्म ले रहे हैं। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर 1945 में गिराए गए परमाणु बमों का दुष्प्रभाव अभी तक खत्म नहीं हुआ है। नॉर्मेडी (फ्रांस) के एक नाभिकीय अपशिष्ट शोधन केंद्र के आसपास खेलने वाले बच्चों का जीवन इससे इस कदर प्रभावित हुआ है कि वैज्ञानिकों के मुताबिक ये बच्चों आगे चलकर रक्त कैंसर के शिकार हो सकते हैं। यह लाइलाज बीमारी है। फिर ऐसी ऊर्जा की हमें क्या जरूरत है, जो मानव जाति के लिए ही अभिशाप हो?
शैलेंद्र कुमार, नेहरू विहार, दिल्ली

वाह रे कॉमनवेल्थ
अजीब विडंबना है कि कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर जहां कॉमन मैन की वेल्थ लगाई जा रही है, वहीं महंगाई और बरसात के बीच उसकी हेल्थ घटाई जा रही है। असली मायने में यही कॉमन होना है।
माधवी यादव, मुखर्जी नगर, नई दिल्ली

उच्च शिक्षा का गिरता स्तर
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल लगभग हर रोज उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का दम भरते हैं, लेकिन आज वह किस दयनीय दशा में पहुंच गई है, यह बताने की जरूरत नहीं है। एक ओर ग्रेडिंग परीक्षा प्रणाली छात्रों में असंतोष बढ़ा रही है, तो वहीं कॉलेजों में सेमेस्टर सिस्टम को लेकर प्रोफेसर लगातार हड़ताल पर हैं। इन हड़तालों के कारण छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है। दिन-प्रतिदिन नए नियम लागू करने से कॉलेजों में अव्यवस्था फैल चुकी है। सरकार, यूजीसी और प्रोफेसरों की इस तनातनी में जिस वर्ग का सबसे अधिक शोषण और नुकसान हो रहा है, वह छात्र वर्ग है। छात्र बसों, ऑटो का भारी किराया चुकाने के बाद कॉलेज पहुंचते हैं, पर कक्षाओं में इन्हें अध्यापक नहीं मिलते। क्या इसी तरह सिब्बल दिल्ली विश्वविद्यालय को
विदेशी विश्वविद्यालयों की श्रेणी में लाना चाहते हैं?
सारिका चौधरी, 71-ए, कुंदन नगर, दिल्ली

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