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हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी

हिन्दी फिल्में, कितनी हिन्दी

दो दिन बाद हिन्दी दिवस आ रहा है। हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में फिल्मों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री खूब पैसा बना रही है और पूरी दुनिया में उसका जलवा है। लेकिन यह जानना कम दिलचस्प नहीं है कि वहां हिन्दी से भरपूर नाम-दाम कमाने वाले अपने कामकाज और जीवन में हिन्दी को कितना सम्मान देते हैं, कितना अपनाते हैं।

यहां अंग्रेजी का बोलबाला है
आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आप हिंदी में फिल्म बना रहे हैं
जावेद अख्तर

मैं युवा पीढ़ी पर कोई दोष नही मढ़ना चाहता हूं, पर सच तो यह है कि इधर हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है। आज अंग्रेजी के लोग हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन में अपना योगदान दे रहे है। मुझे या किसी को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी। अंग्रेजी के जानकार धड़ल्ले से हिंदी की पटकथा लिखें। बस हिंदी या उर्दू के उनके समुचित ज्ञान को परखना जरूरी है। मुश्किल यह है कि इन दोनों गुणों के अभाव के चलते ऐसा हो रहा है। मैं इस बारे में ज्यादा शिकवे-शिकायत नहीं करना चाहता हूं, मगर ज्यादातर हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट की जो हालत हो रही है, उससे मैं बहुत दुखी हूं। असल में आप जिस भाषा में फिल्म बना रहे हैं, उसकी उपेक्षा करें, तो ऐसा होना लाजिमी भी है। मैं इसके लिए सितारों को ज्यादा जिम्मेदार मानता हूं। मैं पुराने दौर के हीरो अमिताभ, राजेश खन्ना आदि की बात नहीं कर रहा हूं। हिंदी को लेकर हिंदी फिल्मों के साथ जुड़े रहना उन्हें पसंद था। आज के कई सितारे भी हिंदी बहुत अच्छी तरह से समझ लेते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वो हिंदी या उर्दू साहित्य के जरा भी नजदीक नहीं है। उर्दू की बात जाने दें, हिंदी पढ़ने में भी उन्हें खासी दिक्कत होती है। इसका सीधा असर अच्छी स्क्रिप्ट पर पड़ता है।

इस मामले में सितारे जरा सा सजग हो जाएं तो न सिर्फ वो अपने लिए अच्छी स्क्रिप्ट तलाश कर सकते हैं, बल्कि खराब स्क्रिप्ट की हालत में बहुत सुधार हो सकता है। और यह सब कुछ भाषा के समुचित ज्ञान से ही संभव है। आखिर आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आप हिंदी में फिल्म बना रहे हैं।

पर एक बड़ा सच यह है कि यहां हिंदी फिल्में सही हिंदी में कम ही लिखी जाती हैं। सरल हिंदी में लिखी पटकथा में भी बीच-बीच में अंग्रजी शब्दों का उपयोग जम कर किया जाता है। ऐसी स्क्रिप्ट यहां कम ही देखने को मिलती है, जिसमें अंग्रेजी शब्दों के मोह से बचते हुए शुद्ध हिंदी या उर्दू के शब्दों का उपयोग किया जाता हो।

अंग्रेजी में बनती हैं हिंदी फिल्में
इसीलिए ज्यादातर को दर्शक पचा नहीं पाते और धड़ाधड़ पिटती हैं
असीम चक्रवर्ती

सूरज बड़जात्या, राजकुमार हिरानी, इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज आदि हिंदी के कुछेक निर्देशक ही ऐसे हैं, जिनके पास हिंदी का समुचित ज्ञान है। वरना आज के ज्यादातर फिल्मकार इस मामले में आधे-अधूरे हैं। यही वजह है कि ज्यादातर हिंदी फिल्मों का पूरा निर्माण कार्य अंग्रेजी में होता है। फिल्म के टाइटल से लेकर उसके प्रचार तक सर्वत्र अंग्रेजी हावी दिखायी रहती है। हॉलीवुड फिल्मों के घोर अनुयायी हमारे ज्यादातर फिल्मकार अक्सर यह भूल जाते हैं कि किसी भी फिल्म को हिट बनाने में देश के दर्शकों का योगदान सबसे ज्यादा होता है। ‘थ्री इडियट्स’ के निर्देशक राजकुमार हिरानी कहते हैं, ‘मैं कहानी कहने और समझनेवाली हिंदी में अपनी फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखता हूं। बेवजह हिंदी को पेचीदा बनाना मुझे पसंद नहीं है। सामनेवाला जितनी आसानी से समझ जाए, मैं वैसी ही हिंदी बोलता हूं। सच तो यह है कि मैं खुद भी हिंदी के कठिन शब्दों का उपयोग करने से बचता हूं। इससे कई कठिन मौकों पर मेरे भाषा का रिद्म नहीं बिगड़ता है। और सभी आसानी से समझ जाते हैं।’ लेकिन कई निर्देशक इस बात को चाहकर भी समझ नहीं पा रहे हैं। अब जैसे कि करण जौहर की फिल्मों की स्क्रिप्ट अंग्रेजी में लिखी जाती है। कभी उनकी टीम में जावेद अख्तर जैसे लोग थे, जिस वजह से हिंदी का चलन देखने को मिल जाता था, पर आज वहां अंग्रेजी का जमावड़ा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि हिंदी में फिल्म बनाने के लिए करण को हॉलीवुड की एक फिल्म ‘स्टेपमॉम’ का राइट्स खरीदना पड़ रहा है। परिणाम सबके सामने है। इस पर बेस्ड करण की नई फिल्म ‘वी आर फैमिली’ ने उनकी प्रतिष्ठा को फिर दांव पर लगा दिया है। अब करण को कौन समझाए कि अंग्रेजी की टीम लेकर हिंदी में फिल्म नहीं बनाई जा सकती। मगर अब वहां तो सब कुछ अंग्रेजी में लिखा जा रहा है।

सोनम कपूर

दिग्गज अभिनेता अनिल कपूर की बेटी सोनम के हाथ में अक्सर कोई अंग्रेजी नॉवेल नजर आ जाता है। आप यदि हिंदी के पत्रकार हैं, तो हिंदी में उनसे बात करना बहुत मुश्किल हो जाता है। आप सोनम से हिंदी में कोई सवाल पूछिए, वो उसका जवाब अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में देना शुरु करेंगी। उसके बाद पूरा जवाब धाराप्रवाह अंग्रेजी मे देंगी। रोमन लिपि में मिले अपने हिंदी संवाद को बोलकर सोनम फिल्म प्रेमियों के बीच अपनी धाक जमाना चाहती हैं। अपने तीन साल के फिल्म कॅरियर में सोनम को कभी हिंदी के बहुत करीब नहीं देखा गया। जबकि उनके पिता हिंदी के बेहद जहीन अभिनेता माने जाते हैं। अंग्रेजी के साथ-साथ अनिल कपूर हिंदी में भी बहुत सहज रहते हैं। मगर उनकी बेटी सोनम हिंदी में लिखे अपने डायलॉग देखकर ही बिदक जाती है। उनके होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘आयशा’ का स्क्रिप्ट अंग्रेजी में लिखा गया था। हिंदी भाषियों ने उसका जो हश्र किया, उसे नए सिरे से बताने की जरूरत नहीं है। सोनम मानती हैं कि अंग्रेजी में शिक्षा-दीक्षा की वजह से उन्हें हिंदी से काफी दूर रहना पड़ा है और यहां फिल्म इंडस्ट्री का सारा काम-काज भी अंग्रेजी में होता है।

हिंदी से कमाती हैं पर आती नहीं
सेलिना जेटली

हिन्दी फिल्मों में लगभग आठ साल के होने को आए, अब भी बोल्ड बाला सेलिना जेटली अपनी बातचीत के दौरान टूटी-फूटी हिंदी में यह कहना नहीं भूलती हैं कि वो लगातार हिंदी सीख रही हैं। हालांकि अब तक उनकी एक दर्जन से ज्यादा फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। खैर, यह भी एक वजह है कि ज्यादातर फिल्मों में सेलिना पर बहुत कम संवाद रखे जाते हैं। और कई बार उनके संवाद डब भी किये जाते है। चूंकि सेलिना बड़ी स्टार नहीं हैं, इस कारण निर्माता उनके हिंदी ज्ञान को छिपाने के बजाय अब उन्हें कास्ट करने से बचने लगे हैं। लेकिन सेलिना हैं कि अब भी हिंदी सीखने की कोशिश कर रही हैं। जबकि सच तो यह है कि इन सालों में यदि वो हिंदी को अपनी जिंदगी में जरा भी अहमियत देतीं तो उनके साथ-साथ दर्शकों का भी भला हो जाता।

नेहा धूपिया

फैशनवर्ल्ड के मंच से आयी अभिनेत्री नेहा धूपिया हिंदी फिल्मो के अपने सवाद ठीक-ठाक बोल लेती है। उनके प्रेमी प्रसिद्ध स्कवास खिलाड़ी रित्विक भट्टाचार्य रियलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हुए नजर आये। नेहा भी इस मामले में अपने प्रेमी को फॉलो करती है। उनकी जीवन शैली में हिंदी की कोई खास अहमियत नहीं है। इस बारे में नेहा का अपना कु-तर्क है, ‘मेरी निजी जिंदगी नही आप मेरे परफोमेंस पर गौर फरमाइए, इसके लिए मै किस माध्यम का उपयोग करती हूं, यह बात ज्यादा मायने नही रखती है।’ शायद अपने इसी सोच के चलते छह साल के अपने फिल्म कॅरियर में हिंदी के योगदान को वो एकदम भूला बैठी है।

ऐश्वर्या राय बच्चन

उनकी अब तक की फिल्मों में ज्यादातर ऐसी हैं जिनमें उनकी आवाज डब की गई है। अब जाकर उन्होंने अपने हिंदी के संवाद खुद डब करना शुरू किया है। सूत्र बताते हैं कि यहां भी हिंदी के कई कठिन शब्द बोलने में उन्हें बहुत तकलीफ होती है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि अमिताभ जैसे हिंदी प्रेमी श्वसुर की बहू ऐश्वर्या यथासंभव हिंदी में बात करने से बचती हैं। अपनी ग्लोबल इमेज को बनाए रखते हुए वो धाराप्रवाह अंग्रजी में बात करती हैं। उनकी प्रेस कांफ्रेंस में हिंदी गायब रहती है। उनके संवाद अंग्रेजी और रोमन में लिखे मिलते हैं। अपने लगभग बारह साल के फिल्म कॅरियर में इस दक्षिण भारतीय अभिनेत्री का हिंदी से कोई लगाव नहीं रहा है। ऐश एक खास अंदाज में इसकी सफाई देती हैं, ‘असल में यहां सारा काम-काज अंग्रेजी में होता है, इस वजह से हिंदी का इस्तेमाल कम करना पड़ता है। वरना जहां जरूरत पड़ती है, मैं हिंदी बोलती ही हूं। जैसे कि ‘पा’ से मेरी ज्यादातर बातें हिंदी में ही होती हैं।’

कोंकणा सेन शर्मा

अत्यंत भाव-प्रवण यह अभिनेत्री आज भी हिंदी का अपना सारा काम रोमन लिपि में लिखी हिंदी को पढ़ कर करती है। बंगभाषी कोंकणा को हिंदी फिल्मों ने बहुत कुछ दिया है। पर इतने सालों बाद भी वो हिदी को अपना दोस्त नहीं बना पाई हैं। जबकि हिंदी वो बहुत अच्छा बोल लेती है। मगर अंग्रेजी उन पर इस कदर हावी है कि हिंदी बोलते समय एक झिझक उनके चेहरे पर बहुत साफ नजर आती है।

सोहा अली खान

लंदन में पढ़ी-लिखी सोहा और उनके भाई सैफ का अति अंग्रेजी प्रेम सर्वविदित है। लेकिन आम जिंदगी में भी बहुत किंचित मौके पर ही सोहा की जुबां से हिंदी के शब्द फिसलते हैं। वो अंग्रेजी मीडिया के करीब रहना चाहती हैं। शायद यह भी एक वजह थी कि कुछेक हिंदी फिल्मों में उनके बेहतर काम को भी हिंदी मीडिया ने नजरअंदाज किया। सोहा यदि कोई दिग्गज अभिनेत्री होती तो हिंदी मीडिया जरूर अपना इगो छोड़कर उनसे अंग्रेजी में ही बात करता।

यह बात मेरे पल्ले ज़रा भी नहीं पड़ती
प्रियंका चोपड़ा

आप हिदी में फिल्में बना रहे हैं, और आपका हिंदी ज्ञान सीमित हो यह बात मेरे पल्ले जरा भी नहीं पड़ती है। मैं हिंदी प्रदेश की लड़की हूं। हिंदी बोलना, पढ़ना और लिखना मेरे लिए एक सामान्य सी बात रही है। जहां तक दूसरे प्रदेश या तबके के लोगों का सवाल है, उनके लिए भी इसका बोलना बहुत सरल है। हिंदी फिल्मों और टीवी सीरियल ने हिदी को घर-घर पहुंचा दिया है। मैं जरा भी इस बात के पक्ष में नहीं हूं कि सिर्फ शोबाजी के लिए हिंदी बोली जाए। लेकिन हिंदी को आसानी से समझने के लिए यदि कोई इसमें कुछ प्रयोग कर रहा है, तो इसका गलत अर्थ नहीं लेना चाहिए। अब जैसे कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री में रोमन हिंदी का बहुत चलन है। हिंदी के कई कठिन शब्द रोमन में लिखे जा रहे हैं। इस पर ज्यादा बावेला मचाने की जरुरत नहीं है। यदि किसी को सही हिंदी लिखना या पढ़ना नहीं आ रहा है, तो वो कम-से-कम उसे रोमन में पढ़ और समझ तो रहा है। मुङो ऐसे लोगों से सख्त चिढ़ है, जो हिंदी में हो रही बातचीत के दौरान धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करते हैं। ऐसे मौके पर वो अपना अंग्रेजी ज्ञान नहीं झाड़ते हैं, बल्कि यह साबित कर देते है कि खुद अपने देश की आम बोलचाल की भाषा से वो कितनी दूर हैं। यदि देश में रहकर भी आप हिंदी पढ-बोल नहीं सकते तो फिर आपकी अंग्रेजी विद्वता किस काम की।
प्रस्तुति : असीम

‘अनजाना-अनजानी’ से मैं हिन्दीवाली हो गई
अद्वैता काला

मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं हिन्दी फिल्मों के लिए लिखूंगी। जब मेरी पहली किताब ‘ऑलमोस्ट सिंगल’ बेस्ट सेलर बनी, (बाद में उसका हिन्दी अनुवाद ‘लगभग सिंगल’ नाम से आया था) तब मुझे काफी फिल्मों के ऑफर्स आए। फिर भी मैं इनकार करती गई। मेरी सोच यह थी कि फिल्मों और किताबों का मध्यम अलग होता है। अजीब बात है कि एक दुखद घटना कि वजह से मैं फिल्मों में आई। मैं लगभग सिंगल का सीक्वल लिख रही थी जब मुंबई बम धमाकों का हादसा हुआ। मैं खुद होटल इंडस्ट्री में रही हूं और मैंने ताज और ओबेरॉय होटलों में काम किया है, इस हादसे के बाद जिस मजकिया अन्दाज में मुझे दूसरी किताब लिखनी थी, पर वह मैं लिख नहीं पाई। चूंकि यह किताब मेरे ताज ओर ओबेरॉय होटल के अनुभवों से प्रभावित थी तो मैंने लिखना छोड़ दिया। ठीक इसी समय मुझे ‘अनजाना-अनजानी’ फिल्म लिखने का ऑफर मिला। मैंने सोचा कि नए माहौल में नए लोगों के साथ एकजुट होकर एक नई तरह का काम करने का मौका मिलेगा, इससे मैं काफी उत्साहित हो गई। मेरा यह निर्णय काफी पर्सनल था। इस तरह मेरी फिल्मों का सफर शुरू हुआ।

अनजाना-अनजानी फिल्म लिखने का अनुभव काफी अद्भुत रहा। किताबें एकान्त में लिखी जाती हैं, अकेलापन आपकी आदत बन जाता है। किताबें मैं अंग्रेजी में लिखती रही हूँ, पर अब हिंदी फिल्म लिखने की चुनौती थी। यह मैं कर पाऊंगी? हिंदी तो मैं बोल पाती हूँ, मेरा ननिहाल कानपुर का है और वहां तो काफी शुद्घ हिंदी बोली जाती है। पर मुङो आप समझ लीजिए एक कॉम्प्लेक्स था। मुंबई में मैंने पढ़ाई शुरू की, मराठी से शुरुआत की, हिंदी से नहीं। जब मैं छुट्टियों में घर लौटती थी, तब सब मजाक उड़ाते थे। तब से दिल में भय सा बैठ गया, और फिर स्कूल में उतने अच्छे नम्बर भी हिंदी में नहीं मिलते थे। मन में मैंने सोच लिया था कि मेरी हिंदी अच्छी नहीं है। और मैं पब्लिक के बीच में हिंदी न बोलने का प्रयत्न करती थी। कुछ लोगों ने मुङो नकचढ़ा समझा होगा, हालत यह थी कि मेरा खुद पर कॉन्फिडेंस नहीं था। जब मैं कॉलेज एजुकेशन के लिए अमेरिका गयी, तब पहली बार महसूस हुआ कि मैं कितनी खुशनसीब थी कि मैं आसानी में दो भाषाओं में सोच सकती हूँ और अगर प्रयत्न करूं तो बोल भी सकती हूँ। मेरे साथ के बाकी स्टूडेंट्स को यह बात मुझ में एक बड़ा प्लस प्वाइंट लगी, क्योंकि वहां ज्यादातर एक ही भाषा बोली जाती है। उनकी नजर से मैंने देखना शुरू किया और मुझे महसूस हुआ कि मुझे सहज ही जो एडवांटेज मिला था, वह मैं अपनी सोच की वजह से गंवा रही थी। मुझे लगा कि मुझे अपना नजरिया बदलना होगा। और वह मैंने किया। रही हिंदी फिल्म की बात, तो हमारे खयालात तो भारतीय ही होते हैं। हमारी जो इमोशनल एक्सपेरिएंस (भावनात्मक अनुभवों) की क्षमता होती हैं, उसकी कोई भाषा नहीं है। इमोशंस की कोई भाषा नहीं होती है, इस समझ के साथ मैं आगे बढ़ी। और मुङो एहसास हो गया कि मेरी यह सोच गलत नहीं थी।

नौजवान पीढ़ी की प्यास है बड़ी, लेकिन ‘बादल’ कब समझेगा?
डॉ. कुमार विश्वास

सवा सौ, डेढ़ सौ करोड़ कान और जबान हिन्दी का स्वाद जानते हैं। दुनिया की इतनी बड़ी आबादी की भाषाई आपूर्ति छोटा-मोटा काम नहीं है। मैं साल में लगभग सौ-सवा सौ उत्सव-धर्मी रातें हिन्दी के नाम पर जागता हूं, जिनमें आधे से ज्यादा देश के अग्रणी शिक्षा संस्थानों में बीतती हैं। आईआईटी मुम्बई के ‘मूड इन्डिगो’ या खड़गपुर के ‘स्प्रिंग-फेस्ट’ से लेकर आईआईएम इंदौर के ‘मृदंग’ या लखनऊ  के ‘जश्न’ तक में मुझे हजारों युवा श्रोताओं का प्राणवान समूह हिन्दी की नवगति-नवलय पर थिरकता मिलता है। दो-ढाई घंटे तक हिन्दी की हर थाप पर किलक-किलक उठती देश की वह जवानी जो ‘एनरिक इग्लेशिआ’ के ‘समबडी मिस यू एवरी सिंगल नाइट’ और खाकसार के ‘कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है’ पर बराबर न्योछावर है, उसे आप हल्के में नहीं ले सकते। मुझे कोई भ्रम नहीं कि मैंने मेघदूत भाग-2 लिख मारा है या बड़के बच्चान जी की मधुशाला मेरे कंठ में उतर आई है। पर ये तय है कि प्यास बड़ी है इस चातक-चौकड़ी की और उत्तर-आधुनिकता से भी आगे जा-जा कर उछल-कूद मचा रहे हिन्दी के साहित्यिक बादल थोथे हैं। बड़ी-बड़ी गोष्ठियों और सभाओं में वक्ताओं और श्रोताओं की संख्या में बराबर का समाजवाद जीने वाले हिन्दी के ये कुल-कलन्दर इतनी सी बात नहीं समझते कि जब टुईयां-से शरीर की आपूर्ति भी जबान के रास्ते उमग-उमग आती है, तो ये तो पूरी पीढ़ी की मांग का मामला है। मुझे लगता है कि समस्या समझाइश की है। नई पीढ़ी की वैश्विक मांग को हिन्दी नियंत्रित नहीं कर सकती, पर उसकी मांग को अपनी साहित्य-चेतना के साथ सम-ताल तो कर ही सकती है। अब आरकुट, फेसबुक, ब्रेक-अप के बीच फंसा नया खून आपके वे छपाऊ  प्रतीक कैसे पकड़े, जो आप जैसे बस सौ-पचास ही पकड़ पाते हैं। मैं नहीं कहता कि लोकप्रिय लिखने के लिए स्तर से नीचे आओ, पर भईए! स्तर के ऐसे टीले पर चढ़ कर भी मत नाचो, जहां खुद के ठुमके पर खुद ही ताली बजानी पड़े। अब भी समय है कि हिन्दी सर्जना के सिपाही साहित्यिक चौकियों पर अपनी पोस्टिंग के लिए लड़ने के बजाए अपनी जिम्मेदारी समझों। दसवीं क्लास के बाद से कोटा में कैमिस्ट्री रटते नए भारत का जीवन-व्याकरण जी न सकें, तो जानें जरूर, क्योंकि जैसा भी है, अब यही है हमारे ‘साहित्य’ भाव का शरीर। बड़ी चुनौती यह भी है कि या तो हिन्दी को दुनिया भर की नई हवाओं के अनुरूप ढलना है या उसे उस तेवर में तैयार करना है, जो दुनिया की हवा बदल दे।

आरकुट, फेसबुक के अपने फैन-क्लब में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेतीं ब्राजीली कन्याओं को मैं ज्यादा तरजीह देता हूं, क्योंकि अपने भारतीय मित्रों से समझे, कच्चे-पक्के अर्थों के माध्यम से ही सही, वे मेरी हिन्दी मां की गोद तक आई तो हैं। हवा बदलने का यह काम हिन्दी बखूबी इसलिए भी कर सकती है कि सौभाग्य से हिन्दी ‘हिन्दू’ नहीं है। इसलिए उसकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता उर्दू से ज्यादा है। नई पीढ़ी को अपना ‘कूल’ चाहिए। अब वह अगर गद्य में चेतन भगत से, और कविता में हम जैसे ‘फ़ूल’ से मिलता है, तो हम क्या करें? कोशिश में लगे हैं कि पिंड छुड़ा कर भागती अपनी आधी आबादी को इन्हीं टॉफी-बिस्कुट छाप चीजों से थामे तो रहें। नहीं तो, मूंग की दाल का पानी पिला कर उदर-शूल सही करने का दावा करने वाले हिन्दी के ये अखाड़ची वैद्यराज तो एक-एक मरीज को ही तरसते रहते हैं। मैं और चेतन पिछले दिनों नागपुर के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में साथ थे, और इस बात पर किसी भी प्रकार से शंकित-लज्जित नहीं थे कि उसके और मेरे, दोनों के इलाकाई फतवेबाज औलिया हम दोनों को कवि या लेखक मानने को तैयार नहीं। पर हम इसी में मस्त हैं, कि -

इस तरह हमने सुलह कर ली पेशवाओं से
उनकी सरकार रहे, अपना भी किरदार रहे।

हिन्दी से न कोई डरता है, न चिढ़ता है। हिन्दी आज भी इस महाद्वीप के लिए मानसून जैसी ही है, जिसका समय थोड़ा आगे-पीछे भले ही हो जाए, या जिसके दस-पांच इंच घटने-बढ़ने से सूखा, या बाढ़ भले ही आ जाए, पर उसकी आस में पूरा मौसम तरसता तो है। जरूरत बस ये है कि हिन्दी की उन पथराई जमीनों पर अपनी चेतना की आंख के कुछ आंसू हम गिरा सकें, जहां वैश्वीकरण की नई हलचलों ने दबाव का क्षेत्र बना दिया है। भाई लोग जाने न जानें, पर खाकसार जानता है कि-
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर कैसी है, मैं तुझसे दूर कैसा हूं
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है।
(लेखक हिन्दी के लोकप्रिय कवि हैं)

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