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आलिमों की कलम और शहीदों का खून

एक इस्लामिक स्कॉलर हैं शेख अब्दुल्ला अज़ान। वह लिखते हैं, ‘मुस्लिम उम्मा की जिंदगी पूरी तरह से उसके आलिमों की कलम और शहीदों के खून पर टिकी होती है।’ क्या बात है? इसे पढ़ कर अच्छा लगता है, लेकिन इसके साथ ही हमें अलग-अलग मजहबों के स्कॉलर की हैसियत पर भी कायदे से सोचना चाहिए। आखिर उनका पैगाम क्या है? वे क्या लिख रहे हैं? अपने लोगों को क्या कहना चाहते हैं? और यह भी कि उनके लोग क्या मतलब निकाल रहे हैं?
 
अब हम सबसे पहले इस्लाम को लेते हैं। अगर हम उनकी आम राय को देखें, तो मुसलमान समाज में सबसे ज्यादा इज्जत ओसामा बिन लादेन की नजर आती है। वह सऊदी अरब के हैं। उनके समर्थक दुनिया भर के मुसलमानों में हैं। उन्हें अल कायदा, तालिबान या दर्जनों नामों से जाना जाता है। ये सब जेहादी हैं।

उन्हें हर काफिर को सबक सिखाना है। लादेन की मुखालफत करने वाले किसी शख्स को नहीं छोड़ना है। सऊदी  अरब का शाही परिवार लादेन के निशाने पर है, लेकिन इसी चक्कर में वह खुद अपने देश में नहीं घुस सकते। फिलहाल, वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान की पहाड़ियों में कहीं छिप कर रहते हैं। अमेरिकियों ने कई बार उन्हें मारने की कोशिश की है। हमारी भी यही कोशिश है, लेकिन वह किसी के हत्थे नहीं चढ़ते।

उनके लोग जेहाद के नाम पर कश्मीर में घुसपैठ करते हैं, इस इरादे के साथ कि उन्हें मासूम हिंदुस्तानियों को मारना है। अगर उस सिलसिले में उनकी जान भी जाए तो चलेगा। आखिर अपना खून बहा कर शहादत जो ओढ़नी है।

अब हिंदुओं पर नजर डालते हैं। सबसे पहले वीर सावरकर जेहन में आते हैं। उनका बड़ा पोर्ट्रेट संसद में लगा है। वह अजीब किस्म के विद्वान हैं। वह इस देश में राजशाही चाहते थे। हिंदू राष्ट्र का वह सपना देखते थे, लेकिन नेपाल नरेश को भारत का सम्राट बनाने की चाहत थी। 

वह यह भी चाहते थे कि यहां रहने वाले अल्पसंख्यकों को उनकी औकात दिखा दी जाए। उन्हें गांधीजी किस्म के लोग सख्त नापसंद थे। उनकी हत्या की साजिश रचने वालों में सावरकर का भी नाम था। जाहिर है उन्हें नेहरू भी पसंद नहीं थे। नेहरू भी तो सभी धर्मो के बीच भाईचारा चाहते थे। वह तो पूरी तरह सेक्युलर थे। उन्हें सावरकर पसंद कर ही नहीं सकते थे।

सावरकर तो आरएसएस किस्म के हिंदू संगठनों की प्रेरणा थे। उसी आरएसएस से ही बीजेपी के ज्यादातर नेता निकल कर आए हैं। ये लोग खाकी निक्कर और सफेद शर्ट पहनते हैं और हाथ में डंडा लिए होते हैं। वे कुछ इस तरह परेड करते हैं, मानो कोई बॉय स्काउट हों। इन्हीं लोगों ने बाबरी मस्जिद ढहाई। गुजरात में मुसलमानों की हत्याओं में भी अहम भूमिका निभाई। वे खून तो बहाते हैं, लेकिन अपना नहीं।
 
आखिर में सिखों पर एक नजर। जरनैल सिंह भिंडरांवाले को आप विद्वान तो नहीं कह सकते, लेकिन उसकी कही बात गंवई लोगों तक पहुंची। वह कहते थे कृपाण के अलावा सिखों को पिस्टल भी रखनी चाहिए। और अपने काम के लिए मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करना चाहिए। वही उनके लोगों ने किया। उनकी बात न मानने वालों के लिए उनका एक ही पैगाम था, मिटा दो। सो, दस साल में भिंडरांवाले के लोगों ने पंजाब में कहर बरपाया। 

अब भी कुछ अधकचरे लोग उनकी याद को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। विदेशों के कुछ गुरुद्वारों में घुसते ही भिंडरांवाले की बड़ी-बड़ी तस्वीरें मिलती हैं। कुछ बेवकूफ लड़के उनके पोर्ट्रेट छपी टीशर्ट पहनते हैं।    यही है आलिमों की कलम और शहीदों के खून की दास्तान।

बाद की खुशी
सुरेश कलमाडी से अस्सी के दशक में दोस्ती हुई थी। तब मिलना-जुलना भी होता था, लेकिन उसके बाद मुलाकातें कम होती गईं, फिर बंद ही हो गईं। कुछ हफ्ते पहले वह अचानक घर चले आए। कुछ उखड़े हुए लग रहे थे। संयोग से वह उसी दिन आए थे जब शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की शादी थी। वह शादी उनके बच्चों की मौजूदगी में हो रही थी।

मैंने कलमाडी का मूड ठीक करने की कोशिश में कहा, ‘आप तो अखबारों की सुर्खियों में शशि और सुनंदा से कम नहीं रहते। मुझे उम्मीद है आपकी कहानी का भी उन्हीं की तरह खुशनुमा अंत होगा’ यानी ‘और उसके बाद वे खुशी से रहने लगे।’ वह मुस्कराए और बोले, ‘मुझे उनसे ज्यादा मीडिया कवरेज मिल रही है। जहां तक उसके बाद खुशी से रहने की बात है, वह तो मैं कॉमनवेल्थ के बाद ही जान पाऊंगा।’   

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