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कृष्ण प्रेम की घनीभूत मूर्ति हैं राधाजी

कृष्ण जन्म के बाद नारद जी ने सोचा कि जब कृष्ण आविर्भूत हुए हैं तो उनकी स्वरूप शक्ति भी ज़रूर आई होंगी। समस्त ब्रज में वे खोजते फिरे। अन्त में वे बरसाना गए। वहाँ भी उन्हें कोई खोज नहीं मिली। अन्त में वे रावल गए। रावल यमुना जी के किनारे गोकुल के निकट है। (इस कल्प में कृष्ण का जन्म गोकुल में हुआ और राधा जी का रावल में।

जब नन्द बाबा गोकुल से नन्दगांव आए, तब उनके मित्र वृषभानु महाराज रावल से बरसाना आए। एक समय वृषभानु महाराज स्नान के लिए यमुना जी के घाट पर गए तो उन्हें शतदल कमल पर एक बहुत ही सुन्दर लाली अपने पैर का अंगूठा चूसते हुए मिली, वे उन्हें अपने साथ ले आए)।

नारद जी रावल में वृषभानु महाराज के यहाँ गए और उनसे पूछा कि आपके यहाँ कोई सन्तान हुई है तो उन्होंने कहा कि हाँ एक लाला हुआ था और श्रीदाम जो कि एक वर्ष के थे, उनके सामने ले आए। तब नारद जी ने कहा कि कोई लाली नहीं हुई तो वे उन्हें अन्दर ले गए। वहाँ नारद जी ने नन्हीं बालिका को पलंग पर सोते देखा। वे उन्हें देखकर मुग्ध हो गए। छोटी सी बालिका में इतना अपूर्व सौन्दर्य। वृषभानु महाराज और उनकी पत्नी कीर्तिका को कहा कि मैं इस बालिका की आरती करूंगा और इसका भविष्य बतलाऊंगा, आप पूजा की सामग्री और पुष्प इत्यादि ले आएं।

उनके जाने पर वे उस बालिका की स्तवन-स्तुति करने लगे- हे आद्या देवी आप अपने नाम, रूप, गुण आदि से परब्रह्म कृष्ण को भी वशीभूत करने वाली हो; वे परब्रह्म कृष्ण जो स्वयं ईश्वरों के भी परमेश्वर हैं, वे आपकी आराधना करते हैं इसलिए आपका नाम राधा है और आप सब प्रकार से सब समय उनकी आराधाना करती हैं इसलिए आपका नाम राधिका है।

आपका एक नाम गान्धार्वा भी है। (गन्धर्व नृत्य कला में बड़े चतुर होते हैं) आप अपने नृत्य कला आदि से कृष्ण के चित्त को भी मुग्ध कर देती हैं और हर लेती हैं। इसलिए आपका नाम हरा है। इतने में राधिका जी अपनी अष्टसखियों के साथ प्रकट हो गईं। नारद जी उन्हें देख स्तब्ध रह गए, कुछ बोल न सके। ललिता जी ने कहा- अरे, क्या देख रहे हो, जल्दी स्तवन-स्तुति करो, नहीं तो अभी अप्रकट हो जाएँगी।

नारद जी के मन में था कि मैं उनकी स्तवन-स्तुति करूँगा, उनकी चरणधूलि लूंगा और उनकी दासी की दासी की दासी बनूँ, ये वर मागूँगा। किन्तु उन्हें यह मौका नहीं मिला। उसी समय वृषभानु महाराज और कृतिका जी वहाँ आ गए और राधा जी पुन: बालिका के रूप में आ गईं। तब नारद जी कुसुम सरोवर के निकट (वर्तमान नारद कुंड) तपस्या करने लगे। हजारों वर्ष की तपस्या के बाद उन्हें राधा जी के दर्शन हुए और उनकी सेवा मिली। अथर्ववेद में राधा उपनिषद् में इसका विस्तार से वर्णन है।

एक समय सनक-सनन्दन आदि ब्रह्मा जी के पास स्तुति करते हुए गए और पूछा कि सर्वप्रधान देवता कौन हैं और उनकी कौन-कौन सी शक्तियाँ हैं? उन शक्तियों में कौन सी शक्ति सबसे श्रेष्ठ है? ब्रह्मा जी बोले- ‘‘पुत्रो, मैं तुम्हें अत्यन्त गोपनीय से भी गोपनीय रहस्य बता रहा हूं, अनधिकारी लोगों को यह मत बताना। कृष्ण स्वरूप में भगवान हरि ही परम तत्व हैं और परम देवता हैं।

शास्त्रों में सबसे श्रेष्ठ श्रीमद्भागवत् है। उसमें वर्णन है कि भगवान श्रीकृष्ण ही स्वयं एकमात्र भगवान हैं और बाकी सब तो उन्हीं के अंश या कला हैं। कृष्ण ही स्वयं भगवान हैं। वृन्दावन उनका धाम है और गोप-गोपियों से वे आराधित हैं। उनका आदि नहीं है, वे ही सबके आदि हैं। उनका ही एक वैभव प्रकाश नारायण है। सब अवतार उन्हीं से उत्पन्न हैं। उनकी एक परा शक्ति है जिनका नाम आल्हादिनी शक्ति है। उसे स्वरूप शक्ति भी कहते हैं, वे कृष्ण से अभिन्न हैं। वे ही राधा जी हैं।

कृष्ण की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। कृष्ण भी उनकी आराधना करते हैं। उन्हें प्रसन्न देखकर कृष्ण प्रसन्न होते हैं और कृष्ण को प्रसन्न देखकर वे प्रसन्न होती हैं।’’ इसलिए राधा जी के आर्विभाव दिवस पर हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि  राधा-कृष्ण युगल की सेवा में हमें अधिकार प्रदान करें।

‘‘राधिका जी कौन हैं- ये कृष्ण की प्रणय अर्थात् जाग्रत चेतना हैं। कृष्ण हैं ‘रसो वै स:’। अर्थात् वे सब रसों के आस्वादक भी हैं और सागर भी हैं। राधिका जी उनके प्रेम की घनिभूत मूर्ति हैं। वो प्रेम की घनिभूत मूर्ति महाभाव स्वरूपा विलास के लिए और कृष्ण को आनन्द देने के लिए जब मूर्ति धारण करती हैं, उन्हीं का नाम राधिका जी है।

इनके दर्शन और प्राप्ति बहुत ही दुर्लभ हैं। ब्रह्मा जी जो इस जगत का सृजन करने वाले हैं, जिनके चार सिर हैं और अपने चारों सिरों से जिन्होंने वेदों को प्रकट किया है, ऐसे ब्रह्मा जी तथा शुकदेव गोस्वामी, नारद जी इत्यादि के लिए कृष्ण की चरण रेणु पाना दुर्लभ है तो कृष्ण की स्वरूप शक्ति राधा जी के दर्शन पाना और भी अधिक दुर्लभ है। हरे कृष्ण।।

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