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कसौटी पर होगा राजद और लोजपा गठबंधन

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) का गठबंधन पहली बार विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने जा रहा है। कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे दोनों दल पिछले लोकसभा चुनाव से ही एक गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रहे हैं। जानकार कहते हैं कि इस चुनाव में यह गठबंधन कसौटी पर होगा। सीट बंटवारे के तहत कुल 243 विधानसभा सीटों में से राजद के खाते में 168 और लोजपा के हिस्से में 75 सीटें गई हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में लोजपा का बिहार में सूपड़ा साफ हो गया था। पार्टी प्रमुख रामविलास पासवान खुद अपनी सीट तक नहीं बचा पाए थे, जबकि राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक स्थिति भी काफी कमजोर हो गई थी। राजद सांसदों की संख्या इकाई अंक में आ गई।

राज्य में छह चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के चयन को लेकर दोनों दलों में माथापच्ची का दौर चल रहा है।

पिछले विधानसभा चुनाव के परिणाम को देखा जाए तो फरवरी, 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में लोजपा ने 178 सीटों पर प्रत्याशियों को उतारा था, जिसमें से 29 प्रत्याशी विधानसभा में पहुंच पाए थे। विधायकों की दृष्टि से यह लोजपा के लिए स्वर्णिम काल था। माना जाता है कि उस समय बिहार की सत्ता की कुंजी लोजपा के पास थी। इस चुनाव में राजद ने 215 सीटों पर भाग्य आजमाया था जिसमें 75 सीटों पर ही उसके उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था।

इस चुनाव के बाद राजद ने सरकार बनाने के लिए लोजपा से समर्थन भी मांगा था, परंतु मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग को लेकर लोजपा ने राजद का साथ नहीं दिया था। इस स्थिति में बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा था।

इसके बाद नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव परिणाम से उत्साहित लोजपा ने 202 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन लोजपा के 10 प्रत्याशी ही चुनाव जीत सके। यही नहीं, राजद को भी पिछले चुनाव की तुलना में इस चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा था। राजद ने कुल 175 सीटों पर चुनाव लड़ा, परंतु उसे 54 सीटों पर ही जीत मिली।

इसके बाद दोनों दलों ने मत विभाजन रोकने के लिए तालमेल कर चुनाव लड़ना ही श्रेयस्कर समझा। पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार दोनों दलों ने गठबंधन किया, जिसे जनता ने नकार दिया। राजद के चार प्रत्याशी ही लोकसभा पहुंच पाए, जबकि लोजपा का कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका।

राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि गठबंधन के लिए यह चुनाव कसौटी है, लेकिन वे इसे सिरे से खारिज नहीं करते हैं। वे इतना जरूर कहते हैं कि नए समीकरण और मुद्दे के साथ लड़े जाने वाले इस चुनाव में किसी गठबंधन के लिए 'वैतरणी' पार करना आसान नहीं है।

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