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22 फरवरी, 2020|8:42|IST

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झारखंड में गणतंत्र के मायने

झारखंड बनने के बाद यह नौवां गणतंत्र दिवस है। इन नौ वर्षो पर यदि नजर दौड़ायें, तो साफ हो जाता है कि खनिज संपदा से भरपूर इस राज्य में गणतंत्र के सभी मायने बेकार साबित हो रहे हैं। राज्य तो बना, लेकिन यहां के लोग आज भी मूलभूत समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता के कारण प्रशासनिक शिथिलता इसके लिए जिम्मेवार है। झारखंड के साथ बने दूसर राज्य विकास की दौड़ में बहुत आगे निकल चुके हैं, लेकिन झारखंड लगातार पिछड़ता जा रहा है।ड्ढr निजी ऑपरटरों के भरोसे है रोड ट्रांसपोर्टड्ढr सरकार अपनी परिवहन व्यवस्था नहीं कर पायी है। यह निजी संचालकों के भरोसे ही चल रही है। पथ परिवहन निगम नहीं बनने से अब तक बिहार के साथ देनदारियों और परिसंपत्तियों का बंटवारा नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि निगम बनाये बगैर बंटवारा नहीं हो सकता। इसलिए अब तक यहां बिहार पथ परिवहन निगम ही बसें चलवा रहा है। इससे राजस्व के नुकसान के साथ इसका खमियाजा सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों को भुगतना पड़ रहा है। पर्यटन निगम दो-तीन बसें चलाता है, लेकिन यह नाकाफी है।ड्ढr नहीं हुई सड़कों की नेटवर्किंगड्ढr अरबों खर्च के बाद भी यहां सड़कों की नेटवर्किंग नहीं हो सकी। सड़कों की सूरत बदली जरूर थी, पर यह अस्थायी था। बड़ी कंपनियों ने राज्य से मुंह मोड़ लिया। सड़कें बदहाल हैं। सड़कों के सुदृढ़ीकरण-चौड़ीकरण तथा कालीकरण-मरम्मत के लिए भारी -भरकम बजट का प्रावधान होता रहा, लेकिन सड़कों की सूरत नहीं बदली। जो भी सड़क जांची गयी, घपला ही निकला। सड़कों का जाल बिछाने का प्रयास बेमानी साबित हो रहा है। बड़े प्रोजेक्ट का सपना भी अधूरा है। एनएच की हालत में सुधार के लिए केंद्र पर नजरं टिकी हैं।ड्ढr एक भी पावर प्लांट नहीं लगाड्ढr राज्य में आज तक एक भी पावर प्लांट नहीं लगा, हालांकि 24 एमओयू हुए। इन पर 1.60 अरब के निवेश से 40 हाार मेगावाट बिजली पैदा होनी है। अभी तीन पावर प्लांट से बिजली बन रही है। इसके अलावा केंद्रीय पूल से बिजली ले किसी तरह राज्य का काम चल रहा है। अधिकांश हिस्सा साल भर बिजली संकट की चपेट में रहता है। जरूरत से कम बिजली मिलती है। संकट दूर करने के लिए सरकार के स्तर पर गंभीर प्रयास नहीं हुए।ड्ढr कामकाज की नियमावली भी नहीं बनीड्ढr सरकार अपने कामकाज के लिए अपनी अलग नियमावली भी नहीं बना सकी। दो वर्ष के भीतर राज्य को इसे तैयार कर लेना था। यहां की सरकार आज भी बिहार के नियमों से चल रही है। वित्तीय प्रबंधन के लिए भी कोई नियमावली नहीं बनी। बिहार वित्तीय नियमावली ही झारखंड में प्रभावी है। वित्तीय नियंत्रण के लिए कोषागार संहिता भी बिहार की ही चल रही है। राजस्व के लिए बोर्ड ऑफ मिसलेनियस रूल्स भी बिहार का ही लागू है। सचिवालय अनुदेश भी अपना नहीं। कमेटियां बनीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ है।ं

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