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हर तबके के लिए खुशियों की सौगात लाती है ईद

हर तबके के लिए खुशियों की सौगात लाती है ईद

रमजान में महीने भर आत्मनियंत्रण की कठिन साधना के बाद खुदा के इनाम के तौर पर मनाई जाने वाली ईद अपनी अंतर्निहित आर्थिक व्यवस्था के चलते समाज के हर तबके के चेहरे पर त्योहार की खुशी की चमक बिखेरती है।

आपसी प्रेम और भाईचारे का त्योहार ईद दरअसल एक ऐसी सुगठित सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था का वाहक है जिससे समाज का हर वर्ग किसी न किसी तरह निश्चित रूप से लाभान्वित होता है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना मोहम्मद उमेर ने ईद के आर्थिक और सामाजिक पहलू के बारे में भाषा को बताया कि अल्लाह ने रमजान की बरकत को ईद से जोड़कर एक सुगठित आर्थिक व्यवस्था बनाई है।

उन्होंने बताया कि रमजान के महीने में लोग दिन भर भूखे-प्यासे रहकर खुदा की इबादत के साथ-साथ अपने कारोबार पर पूरी नेकनीयती और निष्ठा से मेहनत करते हैं। खुदा इस मेहनत का सबसे अच्छा फल भी देता है।
मौलाना ने बताया कि साढ़े सात तोला सोना या 52 तोले चांदी अथवा उनकी कीमत के बराबर नकदी के मालिक हर मुसलमान को रमजान में इस सम्पत्ति का ढाई प्रतिशत हिस्से के बराबर धनराशि को जकात के तौर पर अनिवार्य रूप से निकालकर गरीबों में बांटना होता है।

उन्होंने बताया कि ईद अपेक्षाकत सम्पन्न लोगों की जेब से कुछ धन निकालकर उसे जरूरतमंदों की झोली में डालने का बहाना भी है।

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