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जहां उत्सव और मेले हैं जीवंतता के प्रतीक

जहां उत्सव और मेले हैं जीवंतता के प्रतीक

फुलैच- फूलों का अनूठा उत्सव- किन्नौर (हिमाचल प्रदेश), 5 नवम्बर तक

देव भूमि अर्थात् हिमाचल प्रदेश का नाम आते ही याद आ जाते हैं इस प्रदेश में आयोजित होने वाले पर्व त्योहार एवं मेले। मान्यता है कि हिमाचल में 200 से भी अधिक देवी-देवता निवास करते हैं तथा अलग-अलग क्षेत्रों में आयोजित होने वाले त्योहार आज भी पारम्परिक रूप, पूर्ण श्रद्घा एवं विश्वास के साथ मनाये जाते है तथा यहां के निवासियों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुके हैं। जहां लाहौल-स्पीति तथा किन्नौर क्षेत्र में हिन्दू एवं बौद्घ धर्म की संस्कृतियों का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है, वहीं हिमाचल के चम्बा, कांगड़ा तथा अन्य क्षेत्रों में पूर्ण रूप से हिमाचली संस्कृति के दर्शन होते हैं। वर्षा ऋतु एवं शरद ऋतु के आगमन के साथ ही हिमाचल की वादियां नाना प्रकार के फूलों से गुलजार हो जाती है तथा ऋतुओं की विदाई एवं आगमन के अवसर पर यहां के निवासी उत्सव मेले एवं पर्व पर अपनी खुशी का इजहार करते हैं। ऐसा ही एक त्योहार है फुलैच अर्थात् फूलों का अनूठा उत्सव। किन्नौर क्षेत्र में मनाया जाने वाला फुलैच उत्सव भाद्र मास की दसवीं तिथि से प्रारम्भ हो कर कार्तिक मास की दसवीं तक चलता है। परम्परा के अनुसार, मंदिर के पुजारियों द्वारा नामित व्यक्तियों द्वारा ही घाटी से फूल चुनने की प्रथा आज भी चली आ रही है। देवताओं का प्रिय फूल कमल दुर्लभ फूलों में से एक है। नामित व्यक्तियों द्वारा फूल चुनने के पश्चात् मंदिर की चौपाल में एकत्रित कर देवी- देवताओं को पूजा-अर्चना द्वारा अर्पित करने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। बाद में प्रसाद के रूप में फूल ही वितरित किये जाते हैं। पितृ पक्ष के चलते इस अवसर पर अपने पूर्वजों का आह्वान कर उनका आशीर्वाद पाने की कामना भी करते हैं। फुलैच उत्सव के मौके पर संगीत, नृत्य एवं अन्य मनोरंजक गतिविधियों में यहां के निवासियों का उत्साह देखते ही बनता है। इस क्षेत्र के कल्पा स्थान पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हर 12 वर्ष बाद लगने वाले स्पेशल फेस्टिवल में तो मानो पूरा किन्नौर क्षेत्र ही उमड़ पड़ता है। किन्नौर क्षेत्र स्थित किन्नर कैलाश की परिक्रमा भी यहां के निवासियों की आस्था तथा विश्वास का प्रतीक है। किन्नौरवासी अपने आपको देवी-देवताओं का अंश मानते हैं।

छतरारी मेला

चम्बा के नजदीक छतरारी में शक्ति देवी मंदिर के परिसर में लगने वाला मेला धार्मिक गतिविधियों से परिपूर्ण होता है, जिसमें आस -पास के क्षेत्रों के हजारों लोग इकट्ठे होते हैं। इस अवसर पर मणिमहेश ङील के पवित्र जल से मां पार्वती की मूर्ति को स्नान कराया जाता है। तत्पश्चात शुरू हो जाता है मेले का शुभारंभ। इस मेले में विभिन्न प्रकार के स्टॉल्स, खाने-पीने की चीजें तथा मनोरंजन के साधनों के अलावा लोकनृत्यों की प्रस्तुति तथा मास्क डांस विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है तथा बच्चे बूढ़े और जवान सभी इन लोक नृत्यों की धुनों पर पैर थिरकते नजर आते हैं। यह तीन दिवसीय मेला 17 सितम्बर से शुरू होकर 19 सितम्बर तक चलेगा।

कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग- निकटतम हवाई अड्डा शिमला है। शिमला से टैक्सी अथवा राज्य परिवहन की बसों द्वारा रिकांग प्यू और कल्पा पहुंच सकते हैं।

रेल मार्ग- निकटतम रेलवे स्टेशन शिमला है। कालका तक ब्रॉड गेज लाइन तथा कालका से शिमला छोटी रेल लाइन से पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग-दिल्ली से शिमला 380 किमी़, शिमला से करचम 207 किमी़, करचम से सांगला 18 किमी़, करचम से रिकांग प्यू 20 किमी तथा रिकांग प्यू से कल्पा 13 किमी है।

कहां ठहरें

हवाई मार्ग- निकटतम हवाई अड्डा शिमला है। शिमला से टैक्सी अथवा राज्य परिवहन की बसों द्वारा रिकांग प्यू और कल्पा पहुंच सकते हैं।

रेल मार्ग- निकटतम रेलवे स्टेशन शिमला है। कालका तक ब्रॉड गेज लाइन तथा कालका से शिमला छोटी रेल लाइन से पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग-दिल्ली से शिमला 380 किमी़, शिमला से करचम 207 किमी़, करचम से सांगला 18 किमी़, करचम से रिकांग प्यू 20 किमी तथा रिकांग प्यू से कल्पा 13 किमी है। रिकांग प्यू, कल्पा तथा सांगला में ठहरने के लिये हिमाचल टूरिज्म के होटल उपलब्ध हैं, जहां आप ठहर सकते हैं।

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