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मोदी व पहलवानों ने रखी थी भारतीय दल की लाज

मोदी व पहलवानों ने रखी थी भारतीय दल की लाज

भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में अपनी स्थिति में सुधार के लिए ऑस्ट्रेलियाई शहर ब्रिस्बेन में 1982 में हुए खेलों में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ा दल भेजा था लेकिन फिर से पहलवान ही उसके तारणहार बने जिन्होंने चार स्वर्ण पदक जीतकर भारत को छठा स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी।

भारत ने इन खेलों में कुल पांच स्वर्ण, आठ रजत और तीन कांस्य पदक सहित 16 पदक जीते थे। भारत के लिए पांचवां स्वर्ण पदक बैडमिंटन स्टार सैयद मोदी ने एकल स्पर्धा में जीता था। मोदी ने इस तरह से प्रकाश पादुकोण की परंपरा को जारी रखा था जिन्होंने चार साल पहले एड़ांटन में एकल में सोने का तमगा हासिल किया था।

ब्रिस्बेन में 30 सितंबर से नौ अक्टूबर 1982 के बीच हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के 50 से अधिक खिलाड़ियों ने सात खेलों की 65 स्पर्धाओं में भाग लिया था। इनमें से तैराकी 23 स्पर्धाओं में भारतीय तैराक तरणताल में उतरे थे लेकिन कोई पदक तो क्या फाइनल तक भी नहीं पहुंच पाया था।

भारत को बैडमिंटन में मोदी से स्वर्ण पदक की आस थी और वह एकल फाइनल में इंग्लैंड के निक येटस को हराकर अपेक्षाओं पर खरे उतरे थे। भारत के ही प्रदीप गंधे क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ पाए थे जबकि विक्रम सिंह शुरुआती चरण में बाहर हो गए थे। महिला वर्ग में भारत का प्रतिनिधित्व अमी घिया और अमिता कुलकर्णी ने किया था लेकिन वे प्रभाव छोड़ने में असफल रही थी।

पहलवानों ने हालांकि फिर से सोना बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। स्वर्ण पदक जीतने वाले पहलवानों में जगमिंदर सिंह (68 किग्रा) भी शामिल थे जो अभी भारतीय कुश्ती टीम के कोच हैं। उनके अलावा रामचंद सारंग (48 किग्रा), महावीर सिंह (52 किग्रा) और राजिंदर सिंह (74 किग्रा) ने भी सोने का तमगा हासिल किया था।

अशोक कुमार (57 किग्रा), करतार सिंह (90 किग्रा), सतपाल सिंह (100 किग्रा) और राजिंदर सिंह (110 किग्रा) से अधिक रजत पदक जीतने में सफल रहे थे जबकि जयप्रकाश कांगड़ (82 किग्रा) को कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा था।

भारत को इसके अलावा तीन रजत पदक भारोत्तोलकों ने दिलाए थे। भारतीय भारोत्तोलक सात भार वर्गों में उतरे थे लेकिन गुरूनादान कोम्बाय (52 किग्रा), विजय कुमार सतपति (56 किग्रा) और तमिल सेलवन (60 किग्रा)  ने अपने-अपने वर्ग में दूसरा स्थान हासिल किया था।

निशानेबाज़ी में भारत के आठ निशानेबाज़ों ने 12 स्पर्धाओं में भाग लिया था लेकिन उसे पुरुषों की सेंटर फायर पिस्टल की टीम स्पर्धा में रजत और रैपिड फायर पिस्टल की टीम स्पर्धा में कांस्य पदक के रूप में केवल दो पदक ही मिले थे। भारत के इसके अलावा मुक्केबाज़ी की 67 किग्रा में चेनान्द्रा मसीह ने कांस्य पदक दिलाया था लेकिन अन्य पांच भारतीय मुक्केबाज़ों को अपने-अपने भार वर्ग में असफलता हाथ लगी थी।

भारत को हालांकि सबसे अधिक निराशा तैराकी में मिली जिसमें कोई भी तैराक प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं कर पाया। तब तैराकी दल की अगुवाई खजान सिंह कर रहे थे और उन्होंने कुल छह स्पर्धाओं में भाग लिया लेकिन किसी में भी फाइनल में जगह नहीं बना पाए।

खजान सिंह ने पुरुषों की 100 मीटर बटरफ्लाई में एक मिनट 01.65 सेकेंड का निराशाजनक समय निकाला था जबकि 200 मीटर बटरफ्लाई में वह सबसे अंतिम स्थान पर रहे थे। इसके अलावा 200 मीटर वैयक्तिक मेडले में वह 27 तैराकों के बीच 25वें और 400 मीटर वैयक्तिक मेडले में 14 तैराकों के बीच 13वें स्थान पर रहे थे। उनकी अगुवाई में रिले में भी भारतीय टीम प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पायी थी।

जहां तक एथलेटिक्स का सवाल है तो भारत ने कुल तीन एथलीट ही ट्रैक पर उतारे थे जो इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अफ्रीकी देशों के एथलीटों को टक्कर देने में असफल रहे थे।

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