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बिहार जीतेगा या जाति

बिहार चुनाव का बिगुल बजने के साथ फिर यह चर्चा छिड़ गई है कि वहां जातियां जीतेंगी या बिहार? क्या सामाजिक न्याय और विकास का पिछले पांच सालों से बना गठबंधन चलेगा या विकास और कानून व्यवस्था को कुचलता हुआ सामाजिक न्याय का पुराना रथ फिर दौड़ेगा? पिछले कई चुनावों से यह भविष्यवाणी की जाती रही है कि लड़े कोई भी, पर जीतेंगी जातियां ही। जातियों को राममनोहर लोहिया भारतीय समाज का सबसे सुरक्षित बीमा कहते थे, वे चुनावी लोकतंत्र की सबसे लाभकारी पॉलिसी रही हैं। इसी आजमाई गई पॉलिसी के बूते पर राजद के नेता लालू प्रसाद एलजेपी के रामविलास पासवान के साथ गठबंधन बनाकर मैदान में ताल ठोक कर उतर पड़े हैं। उन्होंने अपने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन से भूमि सुधार और बटाईदारी के मुद्दे पर नाराज सवर्णो को भी अपनी तरफ आकर्षित किया है। इस गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी लालू प्रसाद की अपनी छवि रही है। उन्हें अगर बिहार में पिछड़ों-दलितों में स्वाभिमान जगाने का श्रेय दिया जाता है, तो बिहार के विकास को जाम करने और अपराधियों को खुली छूट देने का दोषी भी बताया जाता है। उनकी इस छवि को रामविलास पासवान की छवि कितना धो पाएगी या लालू प्रसाद के हृदय परिवर्तन पर लोग कितना यकीन करेंगे, यह तो समय ही बताएगा। उनके विपरीत नीतीश कुमार ने पिछले पांच साल में राज्य में सामाजिक परिवर्तन के साथ अमन और विकास की जो उम्मीद जगाई है, उसने जाति के दायरे से बाहर जाकर बिहार के लोगों में एक तरह का क्षेत्रीय स्वाभिमान पैदा किया है। मुंबई, पुणे, गुवाहाटी और लुधियाना जैसे देश के तमाम हिस्सों से मारे-भगाए जाने वाले बिहारियों को लगने लगा है कि उन्हें अपने प्रदेश में भी सम्मानजनक रोजगार मिल सकता है।
   
नीतीश कुमार की बिहार विकास पुरुष की यही छवि उन्हें जातियों की बीमा पॉलिसी तोड़ने की ताकत देती है। नीतीश ने महादलित, आर्थिक तौर पर पिछड़े समुदायों और विशेष तौर पर महिलाओं के सबलीकरण का काम करते हुए न सिर्फ  जातियों के वोट बैंकों को खंडित किया है, बल्कि बिहार के जाति संघर्ष को वर्ग संघर्ष की तरफ मोड़ा है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने बिहार के जटिल अंतर्विरोधों को मिटा दिया है और उसे विकसित प्रदेशों की तेज रफ्तार पकड़ा दी है। फिर भी नीतीश ने यह जरूर दिखाया है कि बिहार की सामाजिक-राजनीतिक रूप से जटिल पहेली को खोला जा सकता है और अंतर्विरोधों को नई दिशा दी जा सकती है। नीतीश के सामने लालू-पासवान गठबंधन और कांग्रेस पार्टी उतनी बड़ी चुनौती नहीं है जितनी बड़ी चुनौती उनकी अपनी सहयोगी पार्टी भाजपा। उनकी सफलता और विफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे भाजपा की मदद लेते हुए उससे कितनी दूरी बनाए रख पाते हैं। इसी पर उन्हें अल्पसंख्यकों का समर्थन निर्भर करता है। बाबरी मस्जिद के बारे में आने वाला फैसला एक ऐसा राष्ट्रीय मुद्दा है जो बिहार की क्षेत्रीयता में उथल-पुथल कर सकता है। यह नीतीश को भाजपा से दूरी और अल्पसंख्यकों से नजदीकी बढ़ाने का अवसर दे सकता है। जाति और धर्म के इन पुराने मुद्दों का मुकाबला बिहार स्वयं कर रहा है, इसलिए यह चुनाव दिलचस्प है। 

 

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