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परमाणु कानून से पीछे हट सकती हैं विदेशी कंपनियां: अमेरिका

भारतीय संसद द्वारा पारित परमाणु दायित्व विधेयक में उपकरणों की आपूर्तिकर्ता कंपनियों को दुर्घटना के लिए जवाबदेह बनाए जाने से इन कंपनियों को भारत के 150 अरब डॉलर के परमाणु बाजार में प्रवेश की संभावना पर खतरा दिख रहा है।

भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते को लागू करने के लिए बने अमेरिकी कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जवाबदेही को सीमित करना था। अमेरिकी अधिकारी इस भारतीय विधेयक पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बच रहे हैं लेकिन भारत को उपकरणों की आपूर्ति की इच्छुक कंपनियां इस विधेयक की भाषा से बहुत संतुष्ट नहीं हैं।

भारत के साथ व्यापार करने वाली करीब 300 कंपनियों की संस्था अमेरिका-भारत व्यापार परिषद (यूएसआईबीसी) चाहती है कि भारत परमाणु संयंत्र संचालकों पर पूरी जवाबदेही डालने और मुआवजा दावों के निपटारे के लिए एक व्यवस्था बनाए।

विधेयक के पिछले सप्ताह राज्यसभा में से पारित होने के बाद संस्था ने सधी प्रतिक्रिया में कहा कि ये नियम दुनिया में प्रचलित सबसे बेहतर तरीके पर आधारित हैं और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के कन्वेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कम्पेनसेशन (सीएससी) के अनुरूप हैं।

यूएसआईबीसी ने कहा कि वह भारतीय विधेयक की समीक्षा कर रही है और भारत सरकार से स्पष्टीकरण चाहेगी कि भारतीय और विदेशी आपूर्तिकर्ता भारतीय ऊर्जा उद्योग को मजबूत करने के लिए कैसे भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग (एनपीसीआईएल) के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

संस्था ने चेतावनी दी कि सीएससी के अनुरूप जवाबदेही व्यवस्था की अनुपस्थिति में भारतीय और विदेशी निजी क्षेत्र परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में प्रवेश करने से हिचकेगा। इससे परमाणु ऊर्जा विकास के भारत के प्रयासों में गतिरोध पैदा हो सकता है।

वाशिंगटन स्थित हेरिटेज फाउंडेशन में दक्षिण एशिया के लिए वरिष्ठ शोध सहायक लीसा कर्टिस ने भी चेतावनी दी है कि इस गलत कानून से भारत-अमेरिका के बीच का ऐतिहासिक समझौता प्रभावित हो सकता है।

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