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रूरल डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट, दूर बसे गांव में करियर की छांव

रूरल डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट, दूर बसे गांव में करियर की छांव

गांवों के इस देश में बाजार और सरकार, दोनों की नजर ग्रामीण क्षेत्रों पर है। सरकार जहां गांवों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से विकास की लहर चलाना चाहती है, वहीं बाजार अपना उत्पाद खपाने की रणनीति आए दिन अख्तियार कर रहा है। इन सबके बीच गांव के किसान भी आज बाजार से सीधे-सीधे तालमेल बैठा कर अपना माल बेचना चाहते हैं। वह कंपनियों और बाजार से संपर्क साध कर ज्यादा से ज्यादा कीमत वसूलने की रणनीति अपनाते हैं।

ऐसे प्रतिस्पर्धी माहौल में विकास और बाजार की योजनाओं को सफल बनाने के लिए आज योजनाकार से लेकर कुशल प्रबंधकों की खासी जरूरत है। किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि समझ कर ही किसी भी योजना को अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, जैसे कुछ दशक पहले ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए दुग्ध क्रांति की शुरुआत की गई। इसके तहत दूध और डेयरी उत्पादों को बढ़ावा दिया गया। यह योजना पंजाब, हरियाणा, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में काफी सफल रही। इसमें किसानों को आय का जरिया प्रदान कर ग्रामीण क्षेत्रों को आर्थिक मजबूती प्रदान की गई।

दुग्ध क्रांति की तरह ही योजनाकारों ने हरित क्रांति का आगाज किया। इसमें भी कम लागत में उन्नत बीज के जरिए खाद्य पदार्थों की पैदावार में बढ़ोत्तरी की गई। उत्तरी भारत के कई राज्यों ने इसमें अभूतपूर्व सफलता हासिल की। इसका लाभ सीधे किसानों को मिला और देश को भी। विदेशों से अनाजों का आयात घटा और अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भरता आई। आयात कम होने पर देश का पैसा बाहर जाने से रुका।

ग्रामीण विकास का यह नजारा रातोरात नहीं दिखा। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में है। आज कृषि के कमर्शियलाइजेशन से लेकर ई-विलेज तक की कल्पना को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा चुके हैं। कमोडिटी एक्सचेंज के कारण अब किसानों की फसलों के दाम रोज बदल रहे हैं और उसी आधार पर किसान फसल बेच भी रहे हैं।
विकास की इस निरंतरता को बनाए रखने या उसे सही दिशा देने के लिए आज ऐसे प्रोफेशनल्स और प्रबंधकों की जरूरत विशेष तौर पर पड़ रही है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग स्थापित कर सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के विकास, गरीब और दलित लोगों के उत्थान, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता और महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में काम कर सकें। ग्रामीण स्वास्थ्य की देखभाल, वहां संचार का विस्तार, सामाजिक विकास, भूमि सुधार और उद्यमिता के क्षेत्र में कार्य कर सकें।

विशेषज्ञों के मुताबिक ग्रामीण विकास की योजना में पहले कल्याण और चैरिटी की भावना से काम किया जाता था, अब विकास और ग्रामीण आबादी को सशक्तिकरण प्रदान करने के लिए किया जाता है। उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए किया जाता है।

निजी कंपनियां ऐसी जगहों पर लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने और अपने उत्पाद को खपाने के नजरिए से काम करती हैं। टाटा, रिलायंस और कई उद्योग व संचार से जुड़ी कंपनियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपने विशेष यूनिट बनाए हैं, जिनके लिए उन्हें दक्ष प्रबंधकों और सक्षम लोगों की जरूरत है। उत्पादन के अलावा सरकार द्वारा सामाजिक विकास के लिए तैयार की गई कल्याणकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए भी कुशल प्रबंधन की जरूरत है।

इस काम में विशेषतौर पर प्रशिक्षित करने के लिए सरकार ने गुजरात के आनंद में इरमा यानी इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ ग्रामीण प्रबंधन नाम से संस्थान भी स्थापित किया। संस्थान अपने यहां इस काम के लिए प्रोफेशनल तैयार करता है। इरमा के अलावा देश के अन्य संस्थानों ने भी ग्रामीण विकास में दक्ष लोगों की जरूरत को देखते हुए डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किए हैं, जो आज जगह-जगह चलाए जा रहे हैं।

किस-किस तरह के कोर्स

ग्रामीण विकास और उससे जुड़े प्रबंधन के काम को समझने और उसमें दक्षता हासिल करने के लिए आज सर्टिफिकेट, पीजी डिप्लोमा, एमबीए और एमए जैसे कोर्स विभिन्न संस्थानों में चल रहे हैं। सर्टिफिकेट कोर्स में मुख्य तौर पर ग्रामीण विकास की आधारभूत जानकारी दी जाती है। उसके विविध पहलुओं से रूबरू कराया जाता है।

पीजी डिप्लोमा लर्नर को इस क्षेत्र की योजना, कार्य, उसके निरीक्षण और मूल्यांकन का हुनर सिखाता है। एमए ग्रामीण विकास में भारतीय परिप्रेक्ष्य, ग्रामीण विकास कार्यक्रम, योजना और प्रबंधन, रिसर्च पद्धति और डिजर्टेशन आदि का पाठ पढ़ाया जाता है।

एमबीए जैसे कोर्स छात्रों में मानव मनोविज्ञान, बिहेवियरल साइंस और प्राकृतिक संसाधनों की समझ पैदा करता है। उन्हें ग्रामीण विकास के सिद्धांत मसलन ग्रास रूट लर्निंग, संस्कृति और काम करते हुए सीखने पर बल देता है। वह विकास की योजनाओं के बीच प्रबंधन की कला सिखाता है। उन्हें क्षेत्र विशेष पर प्रोजेक्ट करने को भी देता है।

पढ़ाने वाले संस्थान

देश के मैनेजमेंट संस्थानों और प्रमुख विश्वविद्यालयों में इससे जुड़े कोर्स बखूबी चल रहे हैं। इन संस्थानों में प्रमुख हैं।

इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद व कोलकाता
इंस्टीटय़ूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट यानी इरमा, आनंद
नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी, गाजियाबाद
नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट, हैदराबाद
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, जयपुर
टाटा इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंस, मुम्बई
सेंट जेवियर इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल सर्विस आदि।

विश्वविद्यालयों में इग्नू ग्रामीण विकास में पीजी डिप्लोमा, सर्टिफिकेट और एमए तीनों तरह के कोर्स चल रहे हैं। इसके अलावा महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी एमए स्तर का कोर्स चलाया जा रहा है।

रोजगार के रास्ते

रूरल डेवलपमेंट और मैनेजमेंट से जुड़े कोर्स करने के बाद छात्रों को सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में काम करने के अवसर मिलते हैं। सरकारी एजेंसी के विभिन्न विभागों और राज्य स्तरीय सेंटरों में काम करने का मौका मिलता है। संस्थानों में ट्रेनर, रिसर्चर, कंसल्टेंट और प्रोजेक्ट को-कॉर्डिनेटर जैसे पदों पर काम करने का अवसर है। वे चाहें तो ग्रामीण क्षेत्रों में विकास से जुड़ी स्कीम और कार्यक्रमों को ठेके पर भी कर सकते हैं। प्रतिभाशाली युवाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ और उससे जुड़ी विशेष एजेंसियों में काम करने के अवसर हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्वयंसेवी संगठन अपने यहां ग्रामीण प्रबंधक के रूप में ऐसे लोगों की नियुक्ति करते हैं, जो गांवों में विकास की योजना को अंजाम तक पहुंचा सकें। ऐसे प्रबंधक चाहे तो ग्रामीण क्षेत्रों में अपना एनजीओ खोल सकते हैं। रिसर्च और किसी प्रोजेक्ट पर भी काम कर सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले बैंक भी अवसर मुहैया करा रहे हैं।

जरूरत है प्रशिक्षित लोगों की
प्रो. संजय भट्ट, अध्यक्ष, समाज कार्य विद्यालय, डीयू

ग्रामीण विकास और प्रबंधन की अवधारणा क्या है और इसका विकास कब हुआ?

सत्तर के दशक में एशिया और अफ्रीका के देशों में ग्रामीण विकास एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बना। इन महादेशों की ज्यादातर आबादी कृषि और ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी है। इन लोगों का परिवेश, उनकी कार्यशैली और समस्याओं से शहरी लोग पूरी तरफ वाकिफ नहीं हैं। इसे जानने के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत पड़ी और साथ ही ऐसी शिक्षा की भी, जो ग्रामोन्मुख हो और ग्रामीणों की समस्याओं को समझे और उसे हल कर सके। बांग्लादेश के मो. यूनुस ने इस क्षेत्र पर विशेष बल दिया। स्वयं सहायता ग्रुप बनाया। माइक्रो फाइनेंस और माइक्रो क्रेडिट स्कीम चलाई।

ग्रामीण विकास में कोर्स की भूमिका क्या है?

ग्रामीण विकास और प्रबंधन का एकीकृत कोर्स इसलिए तैयार किया गया, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और प्रबंधन की महत्ता को समझा जा सके। इसमें कृषि, पशुपालन और जीविकोपार्जन के माध्यम को समझने और इससे जुड़ी समस्याओं को हल करने का प्रशिक्षण दिया गया। इस दिशा में आनंद में स्थित इरमा ने शुरू में एक विशेष कोर्स तैयार किया। संस्थान ने ग्रामीण मैनेजर बनाने की बात कही। बाद में चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय ने भी इसका कोर्स तैयार किया। आज इसको लेकर समाजकार्य से जुड़े शिक्षण संस्थान विशेष कोर्स चला रहे हैं। कृषि विश्वविद्यालय भी इससे जुड़े कोर्स चला रहे हैं। प्रबंधन संस्थानों ने भी इस क्षेत्र में काम करने के लिए मैनेजरों की जरूरत को समझते हुए एमबीए इन रूरल मैनजमेंट कोर्स शुरू किया। इनकी देखादेखी कई विश्वविद्यालयों में भी इससे जुड़े कोर्स चल रहे हैं।

रोजगार की क्या संभावनाएं हैं?

यहां सरकारी और गैर सरकारी, दोनों क्षेत्रों में काम करने का मौका है। सरकारी में, मसलन ग्रामीण विकास की योजनाएं, गरीबी उन्मूलन और स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा को लेकर काम करने का अवसर है। आज ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बैंक भी इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को बतौर प्रबंधक नियुक्त कर रहे हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक अवसर मुहैया करा रहा है। इन सबके बावजूद अभी इस क्षेत्र में काफी सुधार की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविकताओं से रूबरू होने के लिए विशेष प्रशिक्षण और कार्य किए जाने की जरूरत है।

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