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कॉरपोरेट छोड़, ली गांव की राह

कॉरपोरेट छोड़, ली गांव की राह

दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक करने के बाद छवि राजस्थान में अपने गांव सोड़ा की सरपंच बन कर गांव को नई दिशा देने का काम कर रही हैं। आशीष कुमार ‘अंशु’ की रिपोर्ट

जयपुर से 65 किलोमीटर पर टोंक जिले का एक छोटा-सा गांव है सोड़ा। यह गांव इन दिनों राजस्थान में अपने सरपंच छवि राजावत की वजह से चर्चा में है।

आमतौर पर गांव के सरपंच की छवि हमारी नजर में कम पढ़े-लिखे व्यक्ति की ही होती है। कोई अपनी अच्छी खासी नौकरी को छोड़ कर गांव नहीं लौटता, उस स्थिति में तो और भी नहीं, जब सामने उसका पूरा करियर पड़ा हो। छवि ने कॉरपोरेट सेक्टर छोड़ कर गांव लौटने का निर्णय किया। शिघ्वैले चित्तूर (आन्ध्र प्रदेश) से दसवीं, मायो गर्ल्स कॉलेज (अजमेर) से बारहवीं और दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक करने के बाद छवि ने एमबीए पुणे से किया। छवि के पिता नरेन्द्र सिंह बताते हैं कि छवि के सरपंच बनने का निर्णय छवि ने और उसके दादाजी ने मिल कर लिया।

इसी साल 4 फरवरी को 1200 मतों के रिकॉर्ड वोट से छवि अपने गांव सोड़ा में सरपंच का चुनाव जीत गईं। इस जीत से
डेढ़ महीने पहले तक छवि ने  इस चुनाव  के संबंध में सोचा भी नहीं था। हुआ यूं कि जब गांव में चुनाव की सरगर्मी तेज हुई तो गांव से लगभग सौ लोग छवि के गोपालपुरा स्थित फॉर्म हाउस पर उसके दादा जी बिग्रेडियर रघुवीर सिंह राजावत के पास चले आए। ब्रिगेडियर सेवानिवृत्त होने के बाद 1977 से 1992 तक पूरे 15 साल स्वयं इस गांव के सरपंच रह चुके थे। बकौल ब्रिगेडियर सिंह ‘मैं राज्य का मुख्यमंत्री होने से बेहतर गांव का सरपंच होने को मानता हूं।’ वे मिजोरम के अपने मित्र ब्रिगेडियर टी सैलो को याद करते हुए कहते हैं, हम दोनों ब्रिगेडियर पद से एक साथ सेवानिवृत्त हुए। वह सेवानिवृत्त होने के बाद अपने राज्य में जाकर मुख्यमंत्री बना और मैं अपने गांव में आकर सरपंच।’

गांव वाले अपने इस पूर्व सरपंच के स्वभाव से परिचित थे, इसलिए वे उनके पास इस आग्रह के साथ आए थे कि राजावत परिवार से ही कोई सरपंच का चुनाव लड़े। चूंकि सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थी, इसलिए ब्रिगेडियर साहब ने अपनी पोती से बात की। उसके हां के साथ ही बात बन गई। छवि के हां कहने के पहले, जहां गांव में सरपंच पद के डेढ़ दर्जन उम्मीदवार थे, उसकी हां के बाद तीन ही रह गए।

सोड़ा गांव के पास ही एक गांव में रहने वाले सरकारी स्कूल में शिक्षक सूर्य नारायण यादव बताते हैं- ‘सरकारी अधिकारियों के सामने जब सरपंचजी अंग्रेजी बोलती हैं तो सबकी बोलती बंद हो जाती है।’ छवि कहती हैं- ‘मैं गांव में सेवा के उद्देश्य से आई हूं। गांव वालों का विश्वास मेरे परिवार पर गहरा है। मुझे उसे कायम रखना है।’

छवि अपनी बात में यह भी जोड़ती हैं, यहां प्रशासन सरपंच को एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल करता है, जिसके कर्तव्य तो ढेर सारे हैं और अधिकार एक भी नहीं। छवि आज अपने सोड़ा गांव की सरपंच हैं। गांव के लिए स्वच्छ जल, स्वच्छ वातावरण, अच्छी शिक्षा और वृक्षारोपण उनकी प्राथमिकता में है। वन विभाग से मिले 417 पौधों को दिखाते हुए छवि कहती हैं- कितनी भाग-दौड़ के बाद यह पौधे मिले हैं। लेकिन इतने से क्या होगा? इसे शुरुआत समझिए। दूसरी और एक योजना पानी की सफाई को लेकर छवि बना रहीं हैं। उनके अनुसार, गांव का पानी पीने योग्य नहीं है।

अपने गांव वालों को अधिक से अधिक सुविधा उपलब्ध कराने के लिए वे उन सभी दरवाजों पर दस्तक दे रहीं हैं, जहां से जरा भी मदद की उम्मीद है। छवि के अनुसार, वे गांव के विकास के मुद्दे पर लगभग एक दर्जन एनजीओज के संपर्क में हैं। सरकारी अधिकारियों से लेकर राजनेताओं तक से मिल रहीं हैं। आज के दिन उनकी सारी व्यस्तता और भागमभाग का सबब एक ही है, गांव का विकास।

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