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खेल प्रेमियों को लुभाने में नाकाम राष्ट्रमंडल खेल की वेबसाइट

खेल प्रेमियों को लुभाने में नाकाम राष्ट्रमंडल खेल की वेबसाइट

राजधानी में 19वें राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजक फेसबुक तथा ट्विटर जैसी सामुदायिक नेटवर्किंग वेबसाइटों का इस्तेमाल करके हाइटेक खेलप्रेमियों को रिझाने की कोशिश भले कर रहे हों लेकिन उनकी अपनी ही वेबसाइट खेलप्रेमियों को संतुष्ट नहीं कर पा रही है।
 
यह वेबसाइट कई मामलों तो अपडेट ही नहीं की जा रही है तो कई मामलों में गुणवत्ता के कारण भी इससे खेलप्रेमियों का मोहभंग होता है। सबसे बड़ी बात तो यह कि देश की बहुसंख्य हिन्दी भाषी जनता का कोई ख्याल आयोजकों ने रखा ही नहीं है।
 
देश में ज्यादातर सरकारी या सार्वजनिक वेबसाइटें कम से कम दो भाषाओं हिन्दी और अंग्रेज़ी में बनाई गई हैं और कुछ मामलों में क्षेत्रीय भाषाओं की भी सुविधा इनमें दी गई हैं लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा में है। आयोजकों का तर्क हो सकता है कि खेलों की वैश्विक पहुंच के लिए अंग्रेज़ी को प्राथमिकता दी गई लेकिन यह तर्क जमीनी सच्चाई से कोसों दूर है।
 
इंटरनेट पर ट्रैफिक के आंकडे रखने वाली वेबसाइट एलेक्सा की मानें तो राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट पर 92 प्रतिशत से ज्यादा हिट भारत के ही विभिन्न शहरों से होते हैं। इस मामले में भारत के बाद दूसरे नंबर पर ऑस्ट्रेलिया और तीसरे नंबर पर इंग्लैंड हैं।
 
वेबसाइट के रख रखाव का आलम यह है कि खेल शुरू होने में अब महज़ एक माह से भी कम समय रह गया है लेकिन वेबसाइट पर बनाया गया मीडिया सेंटर लगभग सालभर पीछे अटका हुआ है। खेलों को लोकप्रिय बनाने की तमाम कोशिशों के बीच इनके कवरेज पर केन्द्रित मीडिया सेंटर बिल्कुल निष्क्रिय सा पड़ा हुआ है।

वेबसाइट के 'प्रेस' खंड में मीडिया सेंटर नाम से स्तंभ संभवत इसलिए शुरू किया गया कि खेलों की कवरेज और इससे संबंधित समाचार आदि आम लोगों तक पहुंचाकर उनकी दिलचस्पी इन खेलों में बढ़ाई जाए लेकिन हालत यह है कि अक्टूबर 2009 के बाद से इसमें किसी समाचार या लेख आदि का प्रकाशन नहीं हुआ है।
 
इस स्तंभ में पहला प्रकाशन गत वर्ष 25 जुलाई को खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी के साक्षात्कार का किया गया। तब से लेकर 12 अक्टूबर तक अलग-अलग अखबारों की कुल 11 कतरनें इस स्तंभ में प्रकाशित हुईं उसके बाद यह ठप्प पड़ गया। यह कतरने जिस फार्मेट में अपलोड की गई हैं, उन्हें खोलना बहुत आसान नहीं है।
 
प्रेस खंड में ही 'न्यूज़ एंड आर्टिकल्स' नाम से एक अलग स्तंभ है जिसमें खेलों से जुड़ी नवीनतम जानकारियां होती हैं लेकिन यह जानकारियां केवल आयोजन समिति की ओर जारी की गई विग्यप्तियों से होती हैं, स्वतंत्र समाचार संस्थाओं की ओर से प्रकाशित आलेख या अन्य सामग्री इस खंड में बहुत कम दिखती हैं। जिससे आयोजन पर स्वतंत्र समीक्षात्मक जानकारी मिल सके।
 
वेबसाइट पर आने वालों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए ब्लॉग जैसे प्रयोग भी किए लेकिन इन्हें भी ठीक से चलाया नहीं जा सका। ब्लॉग की सामान्य धारणा के अनुसार इसमें द्विपक्षीय संचार की व्यवस्था होती है और आमतौर पर पाठक अपनी राय, सुझाव और प्रतिक्रिया देता है जो अन्य पाठकों के लिए सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होती है। लेकिन इस वेबसाइट के मामले में ऐसा नहीं है।

शुरू में इस वेबसाइट पर दो ब्लॉग लाए गए। एक आयोजन समिति अध्यक्ष कलमाडी और दूसरा राष्ट्रमंडल खेलों के शुभंकर शेरा का। लेकिन अब शेरा के मुंह पर ताला लगा दिया गया है और केवल कलमाडी का ब्लॉग चल रहा है। उस पर भी सिर्फ कुछ अखबारों में छपे कलमाडी के लेख कॉपी, पेस्ट किए होते हैं।
 
खेलों के आयोजन में सिर्फ 25 दिन बचे रहने के बावजूद आमलोगों के बीच इस वेबसाइट की लोकप्रियता कितनी हो पाई है, इसका पता इसी बात से चलता है कि बहुत कम संख्या में लोग सीधे इस वेबसाइट पर पहुंचते हैं और इसे लोकप्रिय करने में सबसे बड़ा योगदान सर्च इंजन गूगल का रहा है।
 
बाहरी लिंक से इस वेबसाइट तक पहुंचने वालों में लगभग 70 प्रतिशत गूगल के ज़रिए यहां पहुंचते हैं तो लगभग साढ़े चार प्रतिशत विकीपीडिया की मदद से। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों फेसबुक की मदद से लगभग सात और ट्विटर के ज़रिए लगभग तीन प्रतिशत लोग खेलों की आधिकारिक वेबसाइट पर पहुंच रहे हैं।
 
इसके बावजूद एक आगंतुक वेबसाइट पर औसतन चार मिनट और 47 सेकेंड ही ठहरता है जबकि इसे अपलोड होने में लगभग एक मिनट से ज्यादा समय लग जाता है। हालांकि इस वेबसाइट पर आनेवाले 39 प्रतिशत नेटयूज़र गलती से यहां पहुंच जाते हैं।

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