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पिछला बोझ न हो

वह कहीं दौरे से लौटे थे। आते ही अपनी टीम को बुलाया। एक प्रोजेक्ट बनाने के लिए कह गए थे। उस प्रोजेक्ट को देखा तो झल्लाए। अरे, तुम लोग अपने दायरे से बाहर ही नहीं आ पाते। 

मशहूर साइकोलॉजिस्ट रॉय बॉमिस्टर की हाल ही में एक स्टडी आई है। उसका मानना है कि पहले से तय की हुई सोच से करियर में दिक्कत आ सकती है। बेहतरीन करियर के लिए हमें अपनी सोच को कुछ खुला रखना पड़ेगा।

दरअसल, कुछ भी सोचते हुए हमारा दिमाग खुला होना चाहिए। उस पर कोई और चीज हावी नहीं होनी चाहिए। हम हों, वह लम्हा हो, उसके बीच में कोई और न हो। हम पर पिछला कोई बोझ न हो। हम जब फैसला लें तो उसी चीज को ध्यान में रख कर लें। 

अक्सर सोचते हुए हम ठीक उसी लम्हे पर फोकस नहीं कर पाते। हम बातें तो जरूर करते हैं कि अपने आज में जीना चाहिए। हमें लम्हों में ही जीना चाहिए। लेकिन जब सोचने बैठते हैं, तो न जाने कहां-कहां की चीजें हम उठा कर ले आते हैं।

असल में हमारा दिमाग बुरी तरह से बंधक होता है। हम उसे खोल कर रख ही नहीं पाते। हम जब सोचने निकलते हैं, तो इस या उसकी कही हुई या रटी हुई बातें हमारे जेहन में जमी रहती हैं। और जब कुछ भी जमा रहेगा तो हम खुल कहां पाएंगे। बीते कल और आने वाले कल से पीछा छुड़ाना है, तो हमें कहीं तो खुलना होगा। उससे छुटकारा पाने में कल की दिक्कत बहुत बड़ी रुकावट है।
 
असल में रॉय बॉमिस्टर की स्टडी जो कह रही है, वह हमें दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति की याद दिलाती है। जिद्दू तो मानते हैं कि सोचने में हमारा अतीत बहुत बड़ी दिक्कत है। इसलिए पीछे से जो भी हम ढोकर ला रहे हैं, उस बोझ से छुटकारा पाना जरूरी है।

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