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मनमोहन का पलटवार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने आलोचकों को करारा राजनीतिक जवाब दे दिया है। वे कम बोलते हैं, लेकिन जब बोलते हैं, तब वह माकूल होता है। वे समय-समय पर अपने उन आलोचकों का भ्रम दूर करते रहे हैं, जो सोचते हैं कि वे ऐसे शिक्षक-अर्थशास्त्री हैं, जो संयोग से प्रशासक बन गए हैं और उन्हें राजनीतिक मुहावरा नहीं आता।

जिस किसी आलोचक को अब भी कोई भ्रम बचा हो तो उसे मनमोहन सिंह ने संपादकों के साथ अपनी बैठक में दूर कर दिया है। एक तरफ उन्होंने लगातार फैलाई जा रही इन खबरों का खंडन कर दिया है कि सरकार और कांग्रेस पार्टी में किसी तरह का मतभेद है और दूसरी तरफ यह भी कह दिया है कि अगर मतभेद हैं भी तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

उन्होंने मतभेद को कांग्रेस की लंबी परंपरा से जोड़ते हुए पार्टी को एक आंदोलन बताकर एक राजनेता से आगे बढ़कर सचमुच एक राजनीतिज्ञ जैसा बयान दिया है। उन्होंने उन विश्लेषकों को सोचने-समझने के लिए काफी कुछ कह दिया है, जो यह कयास लगा रहे थे कि शक्तिशाली महासचिव राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी और मंत्रिमंडल का एक धड़ा प्रधानमंत्री के खिलाफ लगातार बगावत कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने भिन्न नजरिये के उदाहरण देकर आज के पूरे परिदृश्य में न सिर्फ अपने महत्व को फिर से स्थापित किया है, बल्कि लोकतांत्रिक असहमतियों को वैधता भी प्रदान की है। उनका यह कहना कि वे अभी रिटायर नहीं होने जा रहे हैं और मंत्रिमंडल में फेरबदल करेंगे, जिसमें युवाओं को जगह देंगे अगर यह संकेत देता है कि सत्ता पर उनकी पूरी पकड़ है और यह भी कि वे टकराव के बजाय समन्वय के लिए रास्ता तैयार कर रहे हैं।

यह युवा राष्ट्र और वृद्ध मंत्रिमंडल जैसी आलोचनाओं का जवाब है और उससे एक समझौता भी, लेकिन समन्वय का यह रास्ता उन्हीं के वरिष्ठ नेतृत्व में बनेगा यह भी स्पष्ट है। वे नेहरू-गांधी से जुड़ी कांग्रेस के लोकतांत्रिक विमर्शो की लंबी परंपरा से अपने को जोड़ते भी हैं और अपनी अलग पहचान छोड़ने के लिए सतर्क भी दिखते हैं।
  
यहां उनका यह कहना विशेष अर्थ रखता है कि उनकी कैबिनेट में नेहरूजी की कैबिनेट के मुकाबले ज्यादा सुसंगति है। इसके माध्यम से जहां वे नेहरूजी को बड़े लोकतांत्रिक नेता के रूप में मान्यता देते हैं, वहीं अपने कैबिनेट में अनुशासन न होने के आरोपों को खारिज करते हैं।

समय-समय पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह भी प्रदर्शित करते रहे हैं कि देश की नब्ज को समझने में वे किसी से पीछे नहीं हैं। उनका अतीत जनवादी रुझानों का रहा है और आज भी अगर उनकी नीतियों में जनता की चिंता न होती तो यूपीए का दोबारा सत्ता में आना मुश्किल हो जाता।

पूरे राजनीतिक आत्मविश्वास और सूझबूझ के साथ दिया गया मनमोहन सिंह का यह संदेश इस बात की तरफ भी संकेत करता है कि उन्हें चौथी बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुनी गई सोनिया गांधी का पूरा विश्वास प्राप्त है और वे उन्हें काम करने का भरपूर मौका देना चाहती हैं।

उम्मीद है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह आत्मविश्वास आने वाले दिनों में कश्मीरी अलगाववाद से लेकर माओवाद जैसी समस्याओं और चीन व पाकिस्तान से प्रस्तुत चुनौतियों को हल करने में मजबूती के साथ दिखाई पड़ेगा। 

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