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अब तुम्हारे हवाले..

ो एक कोई समझदार कांूस। ऊपर जाने का टाइम आया तो बेटे को बुलाकर हिसाब किताब पूछा। वह बोला- ‘अस्पताल में इलाज विलाज के दस हाार..कफन क्रिया में चार हाार।’ अगला उछला- ‘पूर 6 हाार की बचत। मरना मंजूर।’ बस एक हिचकी ली और निपट गए। सो जनाबो, मेर टाइम में होते नहीं थे। पूर शहर में एक अस्पताल..सदर हास्पिटल। कान दर्द से कैंसर तक का इलाज वहीं पे होता था। अमूमन लोग घर में ही अदरक, पोदीना, लौंग, तुलसी वगैरा घोंट छान कर राइट टाइम हो जाते थे। धीरे-धीर अस्पताल बढ़े। रोग बढ़े। दवाइयां बढीं। नर्से बढ़ीं। मशीने बढ़ीं। हड़तालें बढ़ीं। कभी सीनियर डॉक्टर हड़ताल पर, कभी जूनियर। कभी नर्से, कभी वार्ड ब्वाय। कभी कंपाउंडर, कभी जमादार। अस्पताल का नाम ‘हड़पताल’ होना चाहिए। साल में 8-10 दिन सब नार्मल रहे तो बिजली हड़ताल पर या ऑक्सीजन सिलिंडर खाली। नो एक्सरे, नो ऑपरशन। मरीा बिना नाड़े के पाजामे जसा ढीला पड़ा हनुमान चालीसा पढ़ रहा है। डाक साब की पे बाद में बढ़ेगी, मरीा दर्द से पेट पर तबला बजा रहा है। कई साल पूर्व मुझे अस्पतालनशीन होने का सौभाग्य मिला। बदइंतजामी की परड देखकर मरीाों के घर वालों ने मंत्री जी के बंगले का रुख किया। पता लगा कि मंत्री जी ही रिााइन करके दूसरी पार्टी में एंट्री कर चुके हैं। माथा पीटा, अस्पताल लौटे। जब तक जड़ पानी में तब तक फल की आस। शायद हड़ताल टूट जाए और मरीा की आस्तीन में ‘ड्रिप’ लग जाए। करवा चौथ का चांद देखने औरतें भी साल में एक बार छत पर आ ही जाती हैं। शायद डाक साब भी हड़ताल खत्म होते ही एक बार राउंड पर आ ही जाएं। ट्रे में कीमती दवाएं और इंोक्शन लेकर ‘स्पेशल वार्ड’ की ओर जाती हुई नर्स को मरीा हसरत से देखता है। वार्ड ब्वाय इशार से समझा देता है कि यह मिठाई मक्िखयों के लिए नहीं है। तुम्हार तईं पतला दूध आ रहा है। मेर मित्र फिल्म गीतकार स्वर्गीय शैलेन्द्र अस्पताल में भरती थे। ट्राली पर सेब-संतर अपनी तरफ आते देख, चप्पल में पांव डालकर भागने को हुए। बोले- ‘क्या मैं अस्पताल में नहीं हूं?..या इंडिया में नहीं हूं?’ डॉक्टर भी हंस दिया। कुल मिलाकर ऐ शाह जी, किसी का शेर याद आता है- ‘गिर जाओगे तुम अपने मसीहा (डॉक्टर) की नार से..मर कर भी इलाजे दिले बीमार न मांगो।’ अभिनेता स्वर्गीय अशोक कुमार खुद नामी गिरामी डॉक्टर थे। एक बार स्वर्गीय बी. आर. चोपड़ा से बोले- ‘मेर को शूटिंग के दौरान मरना मंजूर है..पर हॉस्पिटल का सेट न हो। आत्मा भटकती रहेगी।’ं

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