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शरीर में है दोबारा अंग बनाने की फैक्ट्री

वैज्ञानिक पिछले कई वर्षो से यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मनुष्य कुछ जानवरों की तरह अपने क्षतिग्रस्त या ‘बीमार’ अंगों की जगह कुदरती तौर पर नए अंग उगा सकता है। नूट्स (एक प्रकार का उभयचर) और जेबराफिश जैसे जानवर अपने कुछ अंगों, यहां तक कि दिल के हिस्से को दोबारा उत्पन्न कर सकते हैं।

यदि मनुष्य भी यह क्षमता प्राप्त कर ले तो एक दिन दिल जैसे महत्वपूर्ण अंग दोबारा उत्पन्न किए जा सकेंगे और दुर्घटनाओं में हाथ-पैर गंवाने वाले लोग नए हाथ-पैर उगा सकेंगे। वैसे अंगों को दोबारा उगाने की कुछ सीमित क्षमता मनुष्य में भी पाई जाती है। मनुष्य कुछ सीमा तक अपना लिवर दोबारा उगा सकता है और बहुत छोटी उम्र में अपनी फिंगरटिप को दोबारा उगा सकता है। इनसे ज्यादा वह और कुछ नहीं कर सकता है।

अब वैज्ञानिकों ने मनुष्य की अंग दोबारा उगाने की क्षमता को सक्रिय करने के लिए कुछ नए सिरे से रिसर्च शुरू की है। स्टैनफोर्ड यूनीवर्सिटी के एक रिसर्च ग्रुप ने टय़ूमर्स को दबाने वाले दो जीनों को निष्क्रिय करके चूहे की मसल कोशिकाओं को युवा चरण में पहुंचा दिया, जहां उन्होंने विभाजित होना आरंभ्भ कर दिया और अंग की मरम्मत में मदद शुरू कर दी। जो बात चूहों पर सही साबित होती है, वह प्राय: मनुष्यों के मामले में भी सच निकलती है। हालांकि वैज्ञानिक हाथ-पैरों को दोबारा उत्पन्न करने की क्षमता हासिल करने से अभी बहुत दूर हैं, फिर भी नई रिसर्च को वैज्ञानिक हलकों में बहुत उम्मीदों से देखा जा रहा है।

यूनीवर्सिटी कॉलेज लंदन में रिजनरेशन के प्रमुख एक्सपर्ट जेरेमी ब्रुक्स ने इसे उत्कृष्ट रिसर्च बताया है। यह सही है कि इस प्रक्रिया को ठीक से समझने में अभी काफी वक्त लगेगा, लेकिन यह खोज भविष्य में अंगों को दोबारा उगाने की चिकित्सा यानी रिजनरेटिव मेडिसिन में महत्वपूर्ण साबित होगी।

अभी रिजनरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में ज्यादातर रिसर्च इस उम्मीद पर टिकी है कि स्टेम सेलों को सामान्य एडल्ट सेल की तरह बर्ताव करने केलिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। स्टेम सेल ऐसे अपरिपक्व सेल होते हैं, जो शरीर के लिए आवश्यक किसी भी विशिष्ट सेल में विकसित हो सकते है। अंगों को दोबारा उगाने के लिए प्रकृति का तरीका कुछ अलग है। पहले घाव की जगह एडल्ट सेल उत्पन्न होते हैं, जो बाद में सेलों को स्टेम सेल जैसी अवस्था में तब्दील कर देते हैं, जहां वे विकसित और विभाजित लगते हैं।

स्टैनफोर्ड के रिसर्चरों ने इस कुदरती प्रक्रिया को दोहराने की दिशा में पहला कदम उठाया है। एक रिसर्चर, हेलेन ब्लो का कहना है कि हम स्तनपायी जीवों ने अंगों के रिजनरेशन की क्षमता खो दी थी क्योंकि टय़ूमर्स को दबाना जरूरी था, लेकिन यदि हम इस क्षमता को सावधानी के साथ पुन: सक्रिय कर दें तो चिकित्सीय तौर पर इसका इस्तेमाल हो सकता है। रिसर्चर टीम के एक अन्य सदस्य, डॉ. पॉमेरान्ट्ज को उम्मीद है कि इस तकनीक को लोगों पर आजमाया जा सकता है।

टय़ूमर को दबाने वाले जीनों से छेड़छाड़ करना एक खतरनाक खेल हो सकता है, लेकिन डॉ. पोमेरान्ट्ज का मानना है कि ड्रग की उचित खुराक देकर इन जीनों को बहुत कम समय के लिए निष्क्रिय किया जा सकता है। दवा का असर खत्म होने के बाद जीन का टय़ूमर निरोधक कार्य बहाल हो जाएगा। टय़ूमर निरोधक दो जीनों में से एक ‘आरबी’ नामक प्राचीन जीन है, जो नूट्स और जेब्रफिश जैसे जंतुओं में टिश्यू के रिजेनरेशन के वक्त कुदरती तौर पर निष्क्रिय हो जाता है।

स्तनपायी जीवों में आरबी जीन केअलावा एक बैकअप जीन भी होता है, जिसे ‘एआरएफ’ जीन कहते हैं। यदि आरबी जीन कैंसर-संभावित सेल को रोकने में नाकाम रहता है तो एआरएफ जीन इस कड़ी को समापन करता है। स्टैनफोर्ड की रिसर्च टीम ने एक केमिकल से इन दोनों जीनों को जब निष्क्रिय किया तो चूहे के मसल सेलों ने विभाजित होना शुरू कर दिया। जब इन कोशिकाओं को चूहे के पेयर में इंजेक्ट किया गया तो इन्होंने उसकी मसल कोशिकाओं केसाथ जुड़ना शुरू कर दिया।

सैन फ्रांसिस्को स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में दीपक श्रीवास्तव और उनके सहयोगी एक दूसरी अप्रोच से टिश्यू को रिजनरेट करने में जुटे हुए हैं। वे भी चूहे पर प्रयोग कर रहे हैं। इन्होंने हृदय के सामान्य टिश्यू को हृदय के मसल सेल में बदलने का तरीका खोज निकाला है। दिल का दौरा पड़ने पर ये सेल नष्ट हो जाते हैं। 

जापानी वैज्ञानिक शिन्या यामानाका ने तीन साल पहले यह बताया था कि जीनों को रेगुलेट करने वाले चार प्रोटीनों को स्किन सेलों में मिलाकर उन्हें भ्रूण-स्टेम सेलों में बदला जा सकता है। डॉ. यामानाका के तरीके से प्रेरित होकर डॉ. श्रीवास्तव और उनके सहयोगियों ने इस तरह के14 प्रोटीनों का चुनाव किया और अंतत: पाया कि इनमें से सिर्फ तीन प्रोटीन हृदय के सामान्य सेलों को मसल सेलों में बदल सकते हैं।

डॉ. श्रीवास्तव का कहना है कि इस खोज का डाक्टरी इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले मनुष्य की कोशिकाओं में इस प्रक्रिया को दोहराने की जरूरत पड़ेगी। इसके पश्चात तीन ऐसे ड्रग विकसित करने पड़ेंगे, जो तीन प्रोटीनों का स्थान लेंगे। इन ड्रग्स को स्टेंट के जरिये हृदय की रक्त धमनियों में प्रविष्ट कराया जाएगा। उम्मीद है कि ये ड्रग हृदय के टिश्यू सेल को मसल सेल में तब्दील करने लगेंगे।

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