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किंगस्टन की क्षमता पर भी उठे थे सवाल

राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी की दिल्ली की क्षमता पर भले ही खिलाड़ियों से लेकर अधिकारी तक सवाल उठा रहे हों लेकिन करीब पांच दशक पहले जमैका के शहर किंगस्टन को भी इस तरह की आलोचना का सामना करना पड़ा था।

किंगस्टन में हुए आठवें राष्ट्रमंडल खेलों से पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंतायें जताई जा रही थी कि यह शहर इन खेलों के आयोजन के लिये जरूरी बुनियादी ढांचा समय पर खड़ा कर सकेगा या नहीं। ये सारी आशंकायें हालांकि निर्मूल साबित हुई और किंगस्टन एक सफल मेजबान बना।

तैयारियों की धीमी रफ्तार, भ्रष्टाचार के मामलों और स्टार खिलाड़ियों के नाम वापिस लेने के कारण दिल्ली में तीन से 14 अक्टूबर तक होने वाले ये खेल भी विवादों के घेरे में है। स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी और पदक की प्रबल दावेदार साइना नेहवाल ने भी कल दिल्ली की क्षमता पर सवालिया उंगली उठा दी थी हालांकि बाद में उसने अपना बयान वापिस लिया।

राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में पहली बार निशानेबाजी तथा बैडमिंटन को 1966 में किंगस्टन में हुए आठवें खेलों में जगह दी गई। इसकी गाज नौकायन और लॉनबॉल पर गिरी। इन खेलों के इतिहास में 1950 के बाद पहली बार ये बदलाव किए गए थे। अदन और सऊदी अरब समेत 34 देशों के 1314 खिलाड़ियों और अधिकारियों ने इन खेलों में हिस्सा लिया।

पहली बार तथाकथित श्वेत राष्ट्रमंडल देशों के बाहर हुए 1966 खेलों में इंग्लैंड ने आस्ट्रेलिया का वर्चस्व तोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया। इंग्लैंड ने 33 स्वर्ण, 24 रजत और 23 कांस्य समेत 80 पदक अपनी क्षोली में डाले। इंग्लैंड ने तलवारबाजी के आठों स्वर्ण पदक अपने नाम किए। खेलों में पहली बार शामिल हुई निशानेबाजी में पिस्तौल स्पर्धा के तीन में से दो पदक इंग्लैंड को मिले। बैडमिंटन में भी पांच में से तीन पीले तमगे इंग्लैंड ने जीते जबकि दो मलेशिया की झोली में गए। आस्ट्रेलिया ने 73 पदक जीते जिनमें 23 स्वर्ण, 28 रजत और 22 कांस्य थे। वेल्स 57 पदक लेकर तीसरे स्थान पर रहा।

न्यूजीलैंड (26), घाना (नौ), त्रिनिदाद और टोबैगो (नौ), पाकिस्तान (नौ), कीनिया (आठ) और भारत (दस पदक) के नंबर इनके बाद रहे। कनाडा ने निशानेबाजी की पिस्तौल और राइफल स्पर्धा में एक एक स्वर्ण पदक जीता।

 

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