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सरकारी महकमें भी कर रहे अरावली के साथ छेड़खानी

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अरावली पहाड़ी के साथ छेड़खानी बदस्तूर जारी है। आम व्यक्ति के साथ सरकारी महकमे भी इसमें पीछे नहीं। अपना काम निकालने के लिए ऐसे अफसर गैर कानूनी काम करने से भी नहीं डर रहे। ऐसे दो सरकारी महकमों के अफसरों को वन विभाग की तरफ से जारी नोटिस इसकी तस्दीक करता है। अलग बात है पर्यावरण कोर्ट में मामला दायर करने से पहले विभागीय कार्रवाई चल रही है। स्पष्टीकरण इन महकमों के अफसरों को देना होगा। इसके बाद ही कोर्ट में मामला पहुंचाया जाएगा। जो काूननी लड़ाई की एक प्रक्रिया है।


दरअसल, छह मई 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ी में खनन पर प्रतिबंध लगाया था। दिल्ली सीमा से पांच किलोमीटर की परिधि इसके लिए तय की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को दूसरा फैसला आया। जिसमें अरावली पौधारोपण प्रोजेक्ट के तहत अरावली में हुए पौधारोपण वाले क्षेत्र को वन आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। गैर वानिकी कार्य पर पूरी तरह रोक लगा दी। आम व्यक्ति के हित से जुड़े विकास के प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले एनओसी लेना अनिवार्य कर दिया। कागजों में तो  अरावली को बचाने की पूरी मुहिम प्रशासन ने आज भी चलाई हुई है। एक महीने में दो सरकारी महकमों के अफसरों का वन विभाग की तरफ से जारी नोटिस असलियत बयां कर रहे हैं। जिनमें प्रतिबंध क्षेत्र में गैर वानिकी कार्य करके नगर निगम तथा हरियाणा पर्यटन निगम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। हालांकि सरकारी महकमों से पहले वन विभाग शिक्षण संस्थान, क्रेशर जोन तथा अरावली से गुजरने वाले सूरजकुंड-बड़खल रोड पर बिना अनुमति के बनी कमर्शियल इमारतों को नोटिस थमाए जा चुके हैं। नगर निगम अरावली में कूड़ा डाल रहा है। ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ है। दूसरी तरफ हरियाणा पर्यटन निगम वन आरक्षित क्षेत्र में गैर वानिकी कार्य कर रहा है।
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वन अधिकारी एपी पांडे: अरावली पर पूरी निगरानी रखी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करने वाले के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

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