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कुछ डरा-डरा, सहमा-सहमा मैं हिंदी का अध्यापक हूं

मैं हिंदी का अध्यापक हूं। हरदम धिक्कारा जाता हूं।
हरदम फटकारा जाता हूं। हरदम दुत्कारा जाता हूं।
सब सहता हूं। चुप रहता हूं।
कोई ज्यादा अपमान करे। मैं अपने पर हंस लेता हूं।
मैं अपने को डस लेता हूं। मैं अपने को कस लेता हूं।
मैं हिंदी का अध्यापक हूं।

वो हिंदी का विद्यार्थी है। उसकी प्रोफाइल एलआईजी उसकी इच्छाएं एमआईजी उसके संसाधन निम्न-निम्न। उसकी उड़ान के आसमान में हिंदी पतंग सी उड़ती है। वह उसको पढ़ने आता है। वह उससे लड़ने आता है। वह उसमें सड़ने आता है। वह उसमें जड़ने आता है। वह उसमें जब कढ़ आता है तो हिंदी हो जाता है। हिंदी ही उसका सपना है। हिंदी समाज ही अपना है। हिंदी ही उसकी रोटी है। हिंदी ही उसकी काया है। हिंदी ही उसकी माया है।

हिंदी गुरबत की मारी है। उस पट्टी की बीमारी है, जिसमें आधी आबादी बसती है। वो जो हिंदी विद्यार्थी है, इस पट्टी से ही आता है। वह लोअर मिडिलक्लास हेय। जिसका न कहीं कुछ श्रेय-गेय। कुछ डरा-डरा सहमा-सहमा। कुछ चंट चतुर चालाक काइयां दीन हीन सा दिखता है।

वह मेहनत करता रहता है। चमचागीरी चेलागीरी वह ऊपर ओढ़ा भक्ति भाव गुरु सेवा का छलिया प्रपंच कर अपनी हिंदी करता है। जो कुछ सिस्टम ने बना दिया वह उसके गोरखधंधे में उस्तादी करना सीख-सीख कुछ-कुछ सा करता रहता है।

उसके विकल्प उसके न पास
हिंदी ही उसकी एक आस!
वह हिंदी का अध्यापक है।
वह हिंदी का विद्यार्थी है।
औरों के धंधे भी ऐसे।

मसलन न कहें कैसे-कैसे? कुछ कह देंगे- ‘अपमान हुआ’- हो जाएगा। हमने भी सबको देखा है। कितने ज्ञानी अज्ञानी हैं कितने मानी अभिमानी है? कब कौन कहां किस तरह बिका? किस-किस की नकल नबीसी में किस-किस ने उस्तादी की है? कब कौन कहां क्या करता है? उनकी फाइल क्यों खोलें अब? वो भी हिंदी के गल्ले हैं। वे भी हिंदी के दल्ले हैं। ये ही हिंदी के हल्ले हैं। हिंदी में कुछ ऐंठू-ऐंठू, कुछ गलत-सलत, अंग्रेजी पढ़ हिंदी के बन आते हैं। जब हिंदी को गरियाते हैं, जब हिंदी को लतियाते हैं, तो भी हिंदी ही सहती है।

सोचना कभी 55 करोड़ हिंदी वालों की लात-बात इक बार किसी को लग जाए उसका क्या होगा? क्यों साथी! यह सोच-सोच अपने से ही कुछ डरी हुई वह शांत भाव में लीन, अभी रोटी रोजी की नित जुगाड़, इसका चूल्हा उसका बरतन उसका पोंछा करती है। इस तरह वही अपने बालगोपालों का कुछ पेट पालती रहती है। वह हिंदी की इंडस्ट्री है। मीडिया और मार्केट ने हिंदी की ताकत को समझा है। कुछ गलत सलत अनपढ़े लोग हिंदी को जब धकियाते हैं तो इसी मुए बाजार बैठ वे अपनी दुकां लगाते हैं।
  
अपनी हिंदी की खातिर ही हिंदी का यह अध्यापक अड़ता है। हिंदी अध्यापक पढ़ता है। हिंदी अध्यापक लड़ता है। साहित्य निपुण कर हिंदी में वह रसिक क्रिटिक कुछ रचनाकार जुटाता है। कुछ पेशेवर बन जाते हैं, कुछ बेपेशा रह जाते हैं। हज्जारों रचनाकारों को पढ़ा-पढ़ा वह रचनाकार बनाता है। धुर निरादर्श के इस युग में, इस ‘अ-महानता’ के इस युग में, हे हिंदी के कटखने बधिक तुम किस आदर्श डुगडगी पर हो नाच रहे? किसकी महानता मान रहे?

हिंदी जैसी है। रहने दो। सह नहीं सको तो कहीं रहो। हम हिंदी के अध्यापक हैं, हम हिंदी के विद्यार्थी हैं। हम हिंदी के अखबार मीडिया फिल्म रेडियो तक फैले। हिंदी की रोटी खाते हैं हिंदी के हित की गाते हैं। हम हिंदी की लाचारी हैं। हम हिंदी की तैयारी हैं। हम हिंदी की नीचाई हैं। हम हिंदी की ऊंचाई हैं। आ जाओ जरा सा साथ-साथ लिख कर देखो पढ़ कर देखो गुनकर देखो। इस पर स्पर्धा कर देखो। इससे कुछ हिंदी चमकेगी। धिक्कारोगे तो बमकेगी! हम हिंदी के अध्यापक हैं। हम हिंदी की तैयारी हैं! तुम क्या जानो?

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  • Web Title:कुछ डरा-डरा, सहमा-सहमा मैं हिंदी का अध्यापक हूं