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सीआरपीएफ की 24 कंपनियों के भरोसे नक्सलियों से निपट रहा बिहार

बिहार के 38 जिलों में से 33 नक्सल प्रभावित हैं। पिछले पांच सालों के दौरान नक्सल प्रभावित इलाकों में वृद्घि हुई है लेकिन संसाधनों की स्थिति कमोबेश पांच वर्ष पहले की ही बनी हुई है। पूरे बिहार में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की मात्र 24 कंपनियां तैनात हैं।

संसाधनों की कमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रविवार को लखीसराय जिले के कजरा थाना क्षेत्र में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में सात पुलिसकर्मियों की मौत हुई और चार को नक्सलियों ने बंधक बना लिया।

इसके बाद पुलिस नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाने की बात करती रही। राज्य के पुलिस प्रवक्ता पी के ठाकुर ने शुक्रवार को कहा कि अभियान के सभी आवश्यक संसाधन जुटा लिए गए हैं और अब नक्सलियों के खिलाफ अभियान तेज किया जाएगा।

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार राज्य में सीआरपीएफ  की मात्र 24 कंपनियां हैं। इनमें से 11 से अधिक कंपनियां झारखंड की सीमा पर तैनात की गईं हैं। नक्सल विरोधी अभियानों के लिए सीआरपीएफ के अलावा पुलिस का विशेष कार्य बल, बिहार सैन्य बल भी हैं परंतु वे नाकाफी है। सूत्रों के मुताबिक राज्य पुलिस ने केन्द्र सरकार से सीआरपीएफ की 4 कंपनियां मांगी हैं।

राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि कई बार केन्द्र सरकार से सीआरपीएफ की अतिरिक्त कंपनियों की मांग की गई लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री के साथ नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में बिहार को दो हेलीकॉप्टर, 100 सेटेलाइट फोन तथा नक्सल प्रभावित जिलों के 100 थानों को सुदृढ़ करने के लिए 200 करोड़ रुपये देने के लिए हरी झंडी मिली लेकिन अब तक जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ है।

राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक आनंद शंकर का कहना है कि राज्य के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में कोई टेलीफोन नेटवर्क काम नहीं करता है। इससे ऑपरेशन में लगे पुलिसकर्मियों का संपर्क टूट जाता है। सेटेलाइट फोन की सख्त आवश्यकता है। एक अन्य पूर्व पुलिस महानिदेशक डी एन गौतम भी कहते हैं कि अत्याधुनिक हथियारों का लाभ पुलिसकर्मियों को तभी मिल पाएगा, जब उनको फील्ड फायरिंग रेंज का अनुभव उपलब्ध हो।

गौतम ने बताया कि अपने कार्यकाल में उन्होंने जमुई जिले में 600 एकड़ भूमि पर पुलिस फील्ड फायरिंग रेंज स्थापित करने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था। अगर यह फायरिंग रेंज बन जाता तो उस क्षेत्र का भी विकास होता और पुलिसकर्मियों को भी अनुभव मिलता।

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