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मल्लिका

मल्लिका

कहानी :  सपनों में आने वाली कुछ अजीब सी तस्वीरें और आवाजें संजना (शीना नायर) को परेशान करती हैं। इन तमाम बातों की खोज ही उसे राजस्थान ले जाती है, जहां उसकी मुलाकात साहिल (समीर दत्तानी) से होती है। शुरुआत में संजना और उसकी बातें उसे कुछ अजीब सी लगती हैं। फोर्ट पहुंचते ही संजना को दिखने वाले सपने और रहस्यमयी आवाजें फिर से सुनाई देने लगती हैं। उसे अपने होटल के कमरे में कुछ अजीब सी परछाइयां भी दिखने लगती हैं। साहिल को होटल के मैनेजर चंदर (राजेश खेड़ा) से बातचीत करने पर परालौकिक ताकतों के बारे में पता चलता है। इसी होटल में रहने वाला होटल का केयर टेकर विक्रम (हिमांशु मलिक) और उसकी पत्नी माया (पूजा) की गतिविधियां भी संदिग्ध हैं। अचानक होटल में एक दिन माया के साथ-साथ कुछ अन्य लोगों की भी रहस्यमय ढंग से हत्या हो जाती है। चंदर को होटल के पुराने कागजों की छानबीन से मल्लिका के बारे में पता चलता है। साहिल-संजना की तहकीकात आगे बढ़ते देख विक्रम होटल के मालिक कौशिक (मामिक) को बुला लेता है, जो लापता हुई मल्लिका का पति होता है।
 
निर्देशन : लगता है कि निर्देशक लुईस विल्सन उन निर्देशकों में से हैं, जो सिर्फ और सिर्फ तकनीक के बल पर खौफ पैदा करना जानते हैं, लेकिन उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि जिस तकनीक के बल पर वह खौफ पैदा करना चाहते हैं, उसके लिए एक अदद स्टोरी की भी जरूरत होती है। परसेप्ट पिक्चर्स ने उन्हें फिल्म तो दे दी और अपना नाम भी पीपीसी हॉररटेन्मेंट कर लिया, लेकिन एक हॉरर फिल्म की जरूरतों से निर्देशक को महरूम रखा। एक हॉरर फिल्म निर्देशित करते समय लुईस विल्सन का ध्यान केवल शीना नायर को कम कपड़ों में दिखाने पर केन्द्रित दिखता है। फिल्म की बाकी एक्ट्रेस के साथ भी उन्होंने यही किया है। देखा जाए तो रामसे ब्रदर्स के हिट फॉर्मूले (पुरानी हवेली, किसी लाचार महिला का बेरहमी से कत्ल, जायदाद पाने की साजिश, बिकनी में बाथरुम सीन्स, पूल साइड ग्लैमर की बरसात, एक बेवकूफ सा इंस्पेक्टर और उसका अर्दली आदि) को लुइस विल्सन ने अंग्रेजीदां ट्रीटमेंट के सहारे दोहराने के अलावा कुछ नया नहीं किया है।

अभिनय :  जब कोई अभिनेत्री अंधाधुंध एक्सपोजर को अभिनय मानने लगे तो समझ लीजिए कि वो किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार है। शीना नायर इसी गलतफहमी का शिकार दिखती हैं। उनका पका हुआ चेहरा और लुकी-छिपी सी काया कतई ग्लैमरस नहीं लगती और उनसे अभिनय की उम्मीद तो करना बेकार ही है। समीर दत्तानी इस फिल्म को भूल ही जाएं तो अच्छा है। मामिक तो कॉमिक कार्टून लगे हैं। बाकी कलाकार भी वेस्ट रहे। केवल सुरेश ने फिल्म को थोड़ा लाइट बनाए रखा। 
गीत-संगीत : अब संगीत कैसा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फिल्म को होल्ड करने के लिए ‘संजोग’ के एक हिट गीत ‘वो भूली दास्तां’ को फिल्म में इस्तेमाल किया गया है। वैसे तो अच्छा ही किया, क्योंकि फिल्म में केवल यही गीत देखने और सुनने लायक है।

कहानी/पटकथा : कहानी में कोई नयापन नहीं है। रामसे ब्रदर्स की 5-10 फिल्में उठा लीजिए, उन्हें मिक्स कीजिए ‘मल्लिका’ तैयार है।

क्या है खास : ग्लैमर और एक्सपोजर से आंखें तर करने वालों के लिए काफी कुछ खास है। 

क्या है बकवास : कॉन्सेप्ट से लेकर उसका ट्रीटमेंट और मल्लिका के लिए शीना नायर का चुनाव।

पंचलाइन : ‘मल्लिका’ नाम में कशिश तो है, लेकिन केवल पोस्टर तक सीमित है। यूं इस फिल्म के न तो पोस्टर देख डर लगता है और न ही फिल्म देख कर किसी तरह का खौफ पैदा होता है। टाइम-मनी दोनों वेस्ट।

सितारे : शीना नायर, समीर दत्तानी, हिमांशु मलिक, पूजा बालुतिया, राजेश खेड़ा, मामिक

बैनर :  पीपीसी हॉररटेनमेंट और ग्लोरियस एंटरटेनमेंट

निर्देशक : लुइस विल्सन

आशीष कपूर, वर्किग, शाहदरा: फिल्म  ‘1920’ के बाद एक अच्छी हॉरर मूवी देखने को मिली है।

विनय जैन, व्यवसायी, आनंद विहार: स्पेशल इफेक्ट्स काफी अच्छे हैं। बाकी तो टाइम-पास फिल्म है।

दीपक, छात्र, पांडव नगर: हॉरर के नाम पर कलंक है ये फिल्म। मेरे तो पैसे और टाइम दोनों बर्बाद गये।

मॉन्टी, छात्र, लक्ष्मी नगर: वन टाइम मूवी है। बाकी फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी तारीफ की जाए।

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