DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ऐ मेरे प्यारे ‘वेतन’

इसकी जानकारी तो पहले से ही थी कि सम्पत्ति सलिल के बढ़ने पर मन-सरोज बढ़ता है। इसके बरक्स बावरा-मन हाय-हाय कर ‘आय’ को त्रिगुणित कर सकता है, यह सत्य विगत दिनों विलोकित हुआ। संसद के सरोवर में तमाम सरोज-मन नजर आए। हंगामा स्वांत: सुखाय। लालटेन की रोशनी में सूफी कवि के शब्दों का शानदार मंचन।

अलाप महंगाई का। प्रलाप आगंतुकों को चाय पानी करवाना पड़ता है। सत्कार न कर पाने की वेदना सतह पर। नहीं होता सैलरी में गुजारा। विलाप नितांत निजी होते हुए भी सार्वजनिक। तन के आयतन के अनुरूप आय का तन विराट ही होना चाहिए। चाय-वाय, सत्कार-वत्कार तो रूपक था।

ठोस गरीब हैं, हमारे माननीय तभी तो सरकार कृपालु है। मूसलाधार उदारता। फोकट की यात्रा, आवास फ्री, बिजली फ्री। फोन काल भी पर्याप्त फ्री। अंतकाल पछताना न पड़े- लूट सके तो लूट।

राजनीति जीवन-यापन के साथ धनोपार्जन की सशक्त विधा है। सम्पत्ति सलिल बढ़ने की पर्याप्त गुंजाइश। राम पता नहीं अब किस झरोखे पर बैठकर सबका मुजरा लेते हैं। वो जाकी जैसी चाकरी के मुताबिक ताको वैसा नहीं देते।

सचिव हमारे अधीनस्थ। उनका वेतन हम से अधिक (उजला) क्यों? शिक्षा गई तेल लेने। श्रेष्ठता बौद्धिकता से नहीं वेतन से निर्धारित होनी चाहिए। सचिव की हैसियत हमसे एक रुपया कम ही होनी चाहिए। होता होगा नेग व्यवहार में एक का इजाफा मांगलिकता का प्रतीक। वेतन में अधिक एक रुपया प्रभुता सूचक है। धुन के पक्कों ने जो धुन बनाई, वह ऑस्कर विजेता भी कम्पोज नहीं कर सके। कोरस गूंजा-
दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ ‘वेतन’ तेरे लिए/ जय हो आप सबकी।/धन दे मातरम्।
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ऐ मेरे प्यारे ‘वेतन’