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दौड़ो यार दौड़ो

बहुत दिनों बाद उनके दोस्त आए थे। शाम को उनके साथ चाय पी रहे थे। वह कुछ कहते-कहते भूल गए थे। काफी देर उसे याद करते रहे। लेकिन बात नहीं बनी। दोस्त ने कहा, ‘यार, इतनी देर तक बैठे-बैठे काम करना ही सबसे बड़ी दिक्कत है। मेरे साथ भी यही होता था, लेकिन जबसे मैं दौड़ने लगा हूं, तबसे कोई परेशानी नहीं आई।’
 
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और यूएस नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ एजिंग की स्टडी कहती है कि ओवरऑल एक्सरसाइज ही दिमाग के लिए अच्छी होती है। उसमें अगर दौड़ लगा लें, तो क्या कहने! असल में दौड़ने से न्यूरोजिनेसिस पर असर पड़ता है और दिमाग में नए सेल का विकास उसी से जुड़ा होता है। डिप्रेशन के लिए भी वही जिम्मेदार होता है।

न्यूरोजिनेसिस में कमी होने से डिप्रेशन हावी हो जाता है। इसीलिए हम जब दौड़ते हैं तो उसमें कमी नहीं आती और हमें डिप्रेशन नहीं होता। फिर दौड़ने से हमारा खून भी दौड़ने लगता है। वह पतला भी बना रहता है। खून किसी भी हाल में गाढ़ा नहीं होना चाहिए। उसके गाढ़ा होते ही बहाव गड़बड़ाने लगता है।
 
अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में हम महसूस करते हैं कि जब कायदे से एक्सरसाइज कर लेते हैं, तो तन और मन कितना खिले रहते हैं। और जब हम बैठे रहते हैं, तो क्या होता है? बैठे-बैठे काम करने से एक किस्म का भारीपन हम पर हावी होने लगता है। धीरे-धीरे वही हल्का सिरदर्द लेकर चला आता है। हम काम करते हैं, लेकिन तरोताजा महसूस नहीं करते। दिमाग भी पस्त सा ही नजर आता है। खुद को थका-थका सा लगता है। 

हमें रोज इसका अहसास होता है, लेकिन हम उसके लिए कुछ करते नहीं हैं। हमारे भीतर कोई कहता है कि दौड़ो। तब क्यों नहीं उसकी बात सुनते। हल्का-फुल्का दौड़ने की कोशिश तो करो।

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  • Web Title:दौड़ो यार दौड़ो