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आप भी मना सकते हैं पर्युषण पर्व

भगवान महावीर के सिद्धान्तों में व्रतों की अवधारणा अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। उन्होंने व्रतों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया। एक ‘महाव्रत’ और दूसरा ‘अणुव्रत’। अणुव्रत का अर्थ है- महाव्रत का आंशिक रूप से पालन या एक देश पालन। चूंकि गृहस्थ जीवन में पूर्ण रूप से महाव्रतों का पालन संभव नहीं है, अत: उन्हीं महाव्रतों की बातों का जितनी शक्ति हो, उतना पालन करके गृहस्थ जीवन में भी साधना की जा सकती है।

ये पांच महाव्रत हैं- 1. अहिंसा, 2. सत्य, 3.अचौर्य, 4. ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। इन महाव्रतों का पूर्ण पालन मुनि अवस्था में ही संभव है। सामाजिक जीवन में गृहस्थ को अणुव्रतों का पालन करना चाहिए। श्रवक (गृहस्थ) एवं श्रमण (मुनि अथवा अनगार)-जैनधर्म का इन दो रूपों में सुव्यवस्थित आचारपक्ष आत्मानुलक्ष्यी है।

‘अप्पा सो परमप्पा’ आत्मा ही परमात्मा है- इस अवधारणा के आधार पर यहां परमात्म-पद की प्राप्ति हेतु प्रत्येक मनुष्य को स्वयं अपना पुरुषार्थ करना पड़ता है, किसी दूसरे के या ईश्वर अथवा दैव के भरोसे नहीं। इसकी प्राप्ति स्वयं रत्नत्रय मार्ग पर चलकर ही सम्भव है।

सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र रूप रत्नत्रय की प्राप्ति र्तीथकरों द्वारा उपदिष्ट आचार संहिता से ही संभव है। व्रताचरण की दृष्टि से साधु और श्रवक का धर्म समान है, अलग नहीं। क्योंकि जिस सदाचरण से साधु को दूषण या पाप लगता है, उसी से श्रवक को भी लगता है। इसीलिए साधुत्व और श्रवकत्व दोनों आगम की आज्ञा में हैं। दोनों में अन्तर केवल मात्र की दृष्टि से है। आंशिक व्रताचरण श्रवकत्व है और सम्पूर्ण व्रताचरण साधुत्व है। श्रवक के देवपूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान- ये दैनिक षट्कर्म प्रमुख माने गये हैं। कहा भी है-
देवपूजा गुरूपास्ति स्वाध्याय संयमस्तथा।
दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने-दिने।।

समग्र श्रवकाचार के अध्ययन से हमें एक व्यवस्थित आदर्श जीवन शैली का दिग्दर्शन होता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र के साथ ही पांच अणुव्रत, दिग्व्रत, अनर्थदण्डव्रत और भोगोपभोग परिमाणव्रत- ये तीन गुणव्रत, देशावकाशिक, सामयिक, प्रोषधोपवास एवं अतिथि-संविभाग- ये चार शिक्षाव्रत, इस तरह इन बारह व्रतों तथा बड़,पीपल,गूलर, कठूमर एवं पाकर- इन पांच उदम्बर फलों तथा मद्य, मांस एवं मधु इन तीन मकान, इस तरह इन आठों का त्याग रूप अष्टमूलगुणों का परिपालन, जुआ खेलना, मांस खाना, मद्यपान, वेश्यागमन, शिकार खेलना, चोरी करना एवं परस्त्रीगमन- इन सप्त व्यसनों का त्याग तथा पूवरेक्त षट्कर्मो के पालन रूप श्रवकों की आचार संहिता से जैन जीवन शैली का आदर्श प्रतिपादित किया गया है।

पर्युषण पर्व इन्हीं व्रतों तथा सात्विक जीवन शैली के अभ्यास के लिए तथा आत्मानुभूति करवाने के लिए प्रति वर्ष भादों के महीने में आते हैं। दिगम्बर तथा श्वेताम्बर दोनों ही कुल अठारह दिनों तक पर्युषण पर्व पूजन, पाठ, व्रत, उपवास तथा स्वाध्यायपूर्वक उत्साह से मनाते हैं। भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ला पंचमी तक श्वेताम्बर तथा भाद्रपद शुक्ला पंचमी से भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी तक दिगम्बर विशेष रूप से मनाते हैं।

पर्युषण पर्व जीवन को सात्विक बनाता है। पर्युषण शब्द का अर्थ है, ‘परि आसमन्तात उष्यन्ते दह्यन्ते पाप कर्माणि यस्मिन तत् पर्युषणम्’ जो सब  तरफ से आत्मा में रहने वाले कर्मो को तपाये या जलाये, वह पर्युषण है। भगवान महावीर ने मनुष्य के सुख तथा दु:ख के कारणों की खोज की और पाया कि मनुष्य अपने सुख और दु:ख का कारण स्वयं है। कोई दूसरा उसे सुखी या दु:खी कर ही नहीं सकता।

हमारी आत्मा में शुभ भाव, अच्छे भाव उत्पन्न होंगे तो शुभ कर्म बंधेंगे और जब वे उदय में आएंगे तो हमें यज्ञ, सफलता, उन्नति, ऐश्वर्य, सम्पदा और वह सब जो हमारे सुखों के अनुकूल हो देंगे। जब हम अशुभ भाव, जैसे किसी दूसरे का बुरा सोचना इत्यादि, करेंगे तो अशुभ कर्म बंधेंगे और जब वे उदय में आएंगे तो हमें अनायास दु:ख, विफलता, अपयश, निर्धनता, इत्यादि प्रतिकूल वातावरण प्रदान करेंगे।

इसी आधार पर भगवान महावीर ने आत्मा के पुरुषार्थ पर विशेष बल दिया और कहा कि ‘अप्पा कत्ता विकत्ता य; सुहाण य दुहाण य’ अर्थात आत्मा अपने सुख-दुख का कत्र्ता, भोक्ता स्वयं ही है। किसी दूसरे में यह ताकत नहीं है कि आत्मा को सुखी या दु:खी बना दे।

(लेखक श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ्म, नई दिल्ली में जैन दर्शन विभाग में आचार्य हैं)

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