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दिशाहीनता की ओर बढ़ता आंध्र प्रदेश

आज से ठीक एक वर्ष पहले के. रोसैया ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुरसी संभाली थी। लेकिन दुर्योग से आंध्र के राजनीतिक मुखिया के रूप में इस बजुर्ग नेता के लिए ये 365 दिन उल्लास के बजाय चिंता की ही वजह अधिक रहे, बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि इस अनुभवी राजनेता ने अपनी आधी सदी से भी अधिक लंबी सियासी पारी में ऐसे बदतर राजनीतिक हालात का सामना पहले कभी नहीं किया था।

दरअसल, इन दशकों में रोसैया की जो सबसे बड़ी ताकत रही, वही अचानक उनके लिए घातक बन गई है। वह हमारे समय के सर्वाधिक गैर-विवादित राजनेता रहे हैं और उन्होंने अनेक मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया। इसीलिए जब पिछले दो सितंबर को हेलिकॉप्टर दुर्घटना में वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत हुई, तो उनके उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी आलाकमान ने रोसैया का नाम तय किया। वरिष्ठता के साथ बेदाग छवि ने ही उनका पलड़ा भारी किया था।

तेलंगाना आंदोलन के अचानक भड़क उठने के अलावा सूखे और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने यह तय कर दिया था कि रोसैया को रात-दिन मुस्तैद रहना पड़ेगा। लेकिन राज्य की वित्तीय स्थिति को लंबे समय तक संभालने के तजुर्बे के बावजूद वह बेलगाम हो रही मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के बजाय अब भी तनी हुई रस्सी पर चलने की ही कवायद कर रहे हैं। यह काम इसलिए और मुश्किल हो गया है, क्योंकि वह वाईएसआर द्वारा मई 2009 के विधानसभा चुनावों में घोषित लोकलुभावन योजनाओं को समेटने में विफल रहे हैं। जाहिर है, मंत्रिमंडल और विधानमंडल दल में वाईएसआर के वफादारों की मजबूत उपस्थिति उन्हें ऐसा करने से रोकती रही है। वर्ष 1991 में ठीक ऐसी ही स्थिति से पी.वी. नरसिंह राव को भी दो-चार होना पड़ा था, जब चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या के बाद वह प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि नरसिंह राव ने राजनीतिक दूरदर्शिता से न सिर्फ अलग खड़े समूह को नियंत्रित किया, बल्कि अपना कार्यकाल भी पूरा किया, लेकिन रोसैया लगातार दिल्ली स्थित केंद्रीय नेतृत्व की मदद पर ही निर्भर रहे हैं। एक मजबूत नेता के रूप में न उभर पाने की यह विफलता ही कुछ हद तक उन समस्याओं के लिए जिम्मेदार है, जो जगन लॉबी द्वारा उनके सामने खड़ी की जा रही हैं। स्वर्गीय मुख्यमंत्री के बेटे और कडप्पा से लोकसभा सदस्य जगनमोहन रेड्डी की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा छिपी नहीं है और वह शुरुआत से ही रोसैया की राह का कांटा बने हुए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के परोक्ष व प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बावजूद वह लगातार रोसैया के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। पार्टी आलाकमान के स्पष्ट निर्देशों के विपरीत जगन पूरे तामझाम के साथ अपनी ‘यात्रा’ पर गए। उनकी यात्रा के मार्ग में हजारों की संख्या में वाईएसआर की प्रतिमाएं लगाई गईं, जिनका जगन ने अनावरण किया। एकाध जगहों पर प्रशासन ने जब इन प्रतिमाओं की स्थापना को रोकने का प्रयास किया, तो वहां जबर्दस्त तनाव पैदा हो गया।

सत्ताधारी पार्टी में जारी राजनीतिक उठापटक से रोसैया ने यह कहकर पीछा छ़ुड़ाने की कोशिश की कि पार्टी के मामलों के लिए उनके पास न तो समय है और ही उनकी इसमें कोई दिलचस्पी है और राज्य कांग्रेस समिति ही राजनीतिक मामलों का निपटारा करेगी। रोसैया की इस राजनीतिक अक्षमता ने ऐसी स्थिति का निर्माण किया है, जिसमें वह उसी मंत्रिपरिषद के साथ काम करने को बाध्य हैं, जो उन्हें वाईएसआर से विरासत में मिली है। वह अपनी पंसद की टीम भी नहीं चुन सकते। 

अभी हाल ही में जब रोसैया रंगारेड्डी जिले के अब्दुलापुरम में गरीबों के लिए बनी आवासीय कॉलोनी के उद्घाटन के लिए पहुंचे, तो वहां युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जबर्दस्त नारेबाजी करके उनके कार्यक्रम को बाधित कर दिया। केंद्र व राज्य सरकार के आधा दजर्न मंत्री मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने की इस घटना के साक्षी थे। इस पूरे राजनीतिक हालात का असर रोसैया की साख पर पड़ा है। नौकरशाही पर उनकी पकड़ ढीली हो रही है और प्रशासनिक सुस्ती के रूप में इसका चौतरफा असर सामने आ रहा है। खुद मुख्यमंत्री को इस प्रशासनिक सुस्ती कर स्वाद चखना पड़ा, जब उन्होंने अपने को हवाईअड्डे पर फंसा हुआ पाया। उनका तिरुपति से हैदराबाद लौटने का टिकट ‘कनफर्म’ नहीं हुआ था, जबकि उसी विमान से कई केंद्रीय और राज्य मंत्री भी सफर कर रहे थे, पर सिर्फ मुख्यमंत्री का टिकट ही प्रतीक्षा-सूची में था। आखिरकार एक मुसाफिर को अपनी सीट रोसैया के लिए छोड़ने को मनाना पड़ा। कुल मिलाकर, आज के आंध्र की राज्य व्यवस्था असंतुष्ट, प्रशासन हतोत्साहित और अवाम बिलकुल दिशाहीन है।
राधा विश्वनाथ
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं
radha.viswanath@gmail.com

 

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