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कहां गया वह ब्रज, कहां गई वह राधा

अगर आप मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय में जाएंगे तो मूर्ति खण्ड में बहुसंख्य ऐसी मूर्तियां मिलेंगी जिन पर नारी स्वरूप अंकित है। संग्रहालय की मूर्तियों को दो भागों में बांटा जा सकता है- मौर्य काल से पहले की और मौर्य कालीन। यह दिखाता है कि ब्रज के इतिहास और संस्कृति दोनों में ही नारी की महिमा प्रबल है। मथुरा संग्रहालय में मौजूद मौर्य कालीन मातृमूर्तियों के चेहरे सांचे की मदद से बनाए गए हैं। 

इनके शेष अंग और आभूषण अलग से चिपकाए गए हैं। पुरातत्वविदों का आकलन है कि ये मूर्तियां बच्चों के खिलौने न हो कर पूजा करने की मूर्तियां हैं। ब्रज में नारी की आराधना के प्रमाण प्रागेतिहासिककाल से मिल रहे हैं। शुंग कालीन मूर्तियों तक आते आते यह स्पष्ट मानवी स्वरूप धारण कर लेती है।

इनमें कलात्मक जोड़े वाली, अनेक आभूषणों से सजी, सौंदर्ययुक्त मूर्तियां तो हैं ही, आम के वृक्ष के नीचे खड़ी ममतामयी मां की मूर्तियां भी हैं जो दाहिनी तरफ झुक कर अपने स्तन से दूध की धारा बहा रही है। श्रीदेवी (लक्ष्मी) की सबसे पहली शुंगकालीन मूर्ति मथुरा से ही प्राप्त हुई थी।

एक वेदिका पर बुद्ध के सामने इंद्र और उनकी अप्सराएं करबद्ध मुद्रा में खड़ीं हैं। यानी ब्रज की संस्कृति में महिलाएं हर दृष्टि से सम्मानीय हैं। वे चाहे सुंदर, लावण्यमयी स्त्री हों या वे देवियां अर्थात माताएं जो विश्वभर के अपने पुत्र-पुत्रियों को आशीष प्रदान करती हैं। ब्रज की प्राचीन मूर्ति कला में मातृदेवी की प्रस्थापना शक्ति के प्रतीक के रूप में की गई है।

क्या वजह है कि ऐसे धनाढ्य इतिहास और संस्कृति के बावजूद महिलाओं के दमन का सबसे प्रबल चक्र आज इसी ब्रज अंचल में देखने को मिलता है। उप्र के निचले और ऊपरी दोआब के अलावा पूर्वोत्तर राजस्थान, पश्चिमी मप्र और हरियाणा में पिछले कईं साल में हुईं ‘ऑनर किलिंग’ की ढेरों वारदात इसका सबूत है।

क्या कारण है कि हज़ारों साल से महिलाओं को ‘देवी’ और ‘अधिष्ठात्री देवी’ का दर्जा देने वाला ब्रज अब उनका हत्यारा बन गया है? क्या महज इसलिए कि उन्होंने अपनी इच्छा से अपने ही गोत्र के भीतर या किसी दूसरी जाति में वर चुनने की हिमाक़त की थी? क्या वृंदावन के वनों में आधी रात के वक्त कृष्ण के साथ महारास रचाने वाली राधाएं आज इस सीमा तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ दी गई हैं कि वैदिक संस्कृति की परंपरागत स्वयंवर लीला की कल्पना ही जघन्य अपराध है।

ब्रज राधा का देश माना जाता है। दरअसल हमारे पढ़े-लिखे समाजों में राधा एक ऐसी ‘वेल्ली’ के रूप में देखी जाती है जिसके पास चौबीसों घंटे कृष्ण के साथ रास रचाने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं था। पढ़े-लिखों की इस ‘बौद्घिक पोथी’ में राधा ही नहीं, ब्रज की सभी गोपिकाएं उतनी ही फालतू बताई जातीं हैं, जितनी राधा थी। 

वेदों में जिन ब्रज समाजों का उल्लेख मिलता है वे मूलत: ऐसे कृषि समाज थे, जहां जीविकोपार्जन का एक महत्वपूर्ण साधन पशुपालन भी हुआ करता था। यदि सिर्फ सूरदास के वर्णन को लिया जाए, पशु पालन के इस पूरे व्यवसाय को संभालने का काम सिर्फ और सिर्फ गोप महिलाएं ही किया करतीं थीं।

जहां तक राधा का ताल्लुक है, वह किसी ‘बेस्ट सेलर’ की कापोल कल्पित नायिका नहीं है जो सिर्फ फंतासी में जीती है। वह प्राचीन वैदिक कृषि समाज की ऐसी नवयुवती है जो उत्पादन के साधनों का उपयोग घर-परिवार अथवा गांव के पुरुषों की बराबरी से किया करती थी। यही कारण है कि वह इसकी मिल्कियत से उस तरह से कटी-टंटी नहीं है जैसी तीसरी दुनिया के समाजों में आज महिलाएं दिखती हैं।

हर युग में कामकाजी महिलाएं और पुरुष जितना काम और परिश्रम करते हैं, उतना ही मनोरंजन करके खुद को तरोताजा बनाए रखते हैं। महारास और रास लीलाओं से बेहतर मनोरंजन भला और क्या हो सकता है? आज के युग में यदि नए सिरे से राधा का मूल्यांकन किया जाए तो वह ब्रज समाज में ऐसी महिला नेत्री के रूप में उभरती है जो साथ की बाकी महिलाओं को न सिर्फ सशक्त बनाती है बल्कि जो उन्हें श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष के सामने बराबरी के स्तर पर खड़ा करने की कोशिश करती दिखती है।

तब क्यों संस्कृति और परंपरा के नाम पर आज इसी ब्रज प्रांत में स्त्रियों को जकड़ कर रखने की नई परंपरा और संस्कृति रचने की कोशिशें  की जा रही हैं? क्या ‘खानदान की आबरू’ तहज़ीब की रवायतों की आबरू से बढ़ चढ़ कर हैं? सुबह और शाम ‘राधा’ का जाप करने वाला ब्रज समाज अपनी बेटी या बहन की हत्या सिर्फ इसलिए करता रहेगा क्योंकि उसकी बहन या बेटी आज के आधुनिक समाज में राधा जैसा बनने की कोशिश कर रही है?

shuklaanil11@gmail.com 

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और संस्कृतिकर्मी हैं

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