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अगर न हुआ तो..

वह प्रोजेक्ट जैसे ही उनके पास आया था, वह खुशी से उछल पड़े थे। मानो उसीका अरसे से इंतजार कर रहे हों। शुरू होने से पहले ही उसकी कामयाबी के सपने देखने लगे थे। लेकिन..डेरेक जे. कोहलर और उनके साथियों आर. जे. व्हाइट और एल. के. जॉन ने एक स्टडी की है।

उनका मानना है कि शुरुआती भरोसा और उम्मीद कभी-कभी भारी पड़ते हैं। हम आनेवाली कामयाबी के साथ नाकामयाबी पर भी सोच लेते हैं, तो बेहतर होता है। वाटरलू यूनिवर्सिटी से आई यह स्टडी है, ‘गुड इन्टेन्शन्स, ऑप्टिमिस्टिक सेल्फ प्रिडिक्शन्स ऐंड मिस्ड अपॉर्चुनिटीज।’ इसे सोशल साइकोलॉजिकल ऐंड पर्सनैलिटी साइंस में छापा गया है।

कहा जाता है कि उम्मीदों और पॉजिटिव होने से ही कामयाबी मिलती है। इसे यह स्टडी भी नहीं नकारती। लेकिन उनका कहना है कि हमें अपने तमाम हौसलों और उम्मीदों के साथ कामयाबी ही नहीं नाकामयाबी पर भी सोच लेना चाहिए। यानी पॉजिटिव और निगेटिव पर एकसाथ सोच लेने से चीजें आसान हो जाती हैं। हम जिंदगी के दोनों पहलुओं के लिए तैयार होते हैं। कोई कह सकता है कि इस तरह से सोचना तो निगेटिव ही हुआ।

यह ऊपर से निगेटिव लग सकता है। लेकिन उसका असर पॉजिटिव ही होता है। कभी-कभी हम किसी काम पर बात करते ही जोश में आ जाते हैं। उसमें कोई गड़बड़ भी हो सकती है। उस पर सोच ही नहीं पाते। लेकिन जिसे कहते हैं न कि प्याले और होंठ के बीच बड़ा फासला होता है। ऐसा ही हमारे साथ भी हो सकता है।

पहले से सोचने पर यह खराब लगता है। लेकिन वह भी तो हकीकत ही है। असल में हमें महज निगेटिव ही नहीं सोचना चाहिए। हमें सोचना पॉजिटिव ही चाहिए। लेकिन निगेटिव को हाशिए पर नहीं डाल देना चाहिए। उस पर भी जरूर एक निगाह डालनी चाहिए।

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