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डेंगू की चुनौती

राष्ट्रमंडल खेल और उसी से जुड़ी दिल्ली की दुश्वारियां खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। भ्रष्टाचार की बाधाओं को पार कर समय पर निर्माण काम पूरा करने की चुनौती अपनी जगह थी ही अब डेंगू की चुनौती ने भी आ घेरा है। दिल्ली और उससे सटे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रोजाना बढ़ते डेंगू के मरीजों की संख्या चार अंकों को पार कर चुकी है।

आशंका है कि इस साल अच्छी बारिश के चलते यह बीमारी लगातार घटने के बजाय सितंबर के महीने में और बढ़ेगी और खेलों के दौरान चरम पर होगी। एक तरफ राष्ट्रमंडल खेलों को शानदार तरीके से आयोजित कराना देश की प्रतिष्ठा का मसला बन गया है तो दूसरी तरफ नागरिकों की जीवन सुरक्षा स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती है। 

खेल की तैयारियों के लिए जो खुदाई और तोड़फोड़ का काम हुआ है उससे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों और मेहमानों के लिए क्रीडा स्थल, आवास और दर्शनीय स्थल बनें उससे पहले इंसानी जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले डेंगू के मच्छरों ने वहां अपना डेरा जमा लिया है।

डेंगू के ज्यादातर मामले दिल्ली नगर निगम के उन्हीं इलाकों से आ रहे हैं जहां पर खेलों के लिए या नगर के सौंदर्यीकरण के लिए अधिक खुदाई हुई है। यहां तक कि यमुना में बाढ़ आने के बाद राष्ट्रमंडल खेलगांव के आसपास भारी पानी जमा हो गया है और वहां भी डेंगू मच्छरों के लार्वा पाए गए हैं।

दूसरों पर जिम्मेदारी डालने की सामान्य भारतीय प्रवृत्ति के तहत दिल्ली नगर निगम कह रहा है कि उसके पास इस बीमारी की चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन नहीं हैं और दिल्ली सरकार कह रही है कि उसे धन और सारी सुविधाएं मुहैया करा दी गई हैं।

इस बीच डेंगू मच्छरों की जांच करने वाले ठेके के कर्मचारी अपने को स्थायी करने की मांग करते हुए छुट्टी पर चले जाने की धमकी दे रहे हैं। अस्पतालों में अलग वार्ड बनाए जाने के बावजूद बिस्तरों की कमी की समस्या आ रही है।
  
उधर दवा कंपनियों की बन आई है और उन्होंने मच्छर भगाने वाली तरह -तरह की क्रीम निकालकर कमाई का अपना धंधा शुरू कर दिया है। स्कूलों में जो संवेदनशीलता शीघ्र आनी चाहिए वह बहुत देर से आ रही है और बच्चों के लिए पूरा शरीर ढकने वाले कोड धीरे-धीरे जारी हो रहे हैं। यह सारी स्थितियां हमारे लिए गंभीर चुनौती भी प्रस्तुत करती हैं।

हम इन गड़बड़ियों और चुनौतियों से न तो सरकारी संस्थाओ को मुक्त कर सकते हैं न ही उन पर सारा जिम्मा डालकर आलोचना का आनंद ले सकते हैं। यह मौका सरकार और समाज दोनों के एक साथ उठ खड़े होने का है। यह समय राजनीति का नहीं रोकथाम के लिए मिलजुल कर काम करने का है। 

यह अवसर अस्पतालों और दवा कंपनियों के लिए पैसा बनाने का नहीं यह संकल्प करने का है कि अमीर या गरीब इस बीमारी से किसी को मरने नहीं देंगे। अगर खेल मनुष्य की श्रेष्ठ क्षमताओं के प्रदर्शन का अवसर है तो याद रखना होगा कि स्वस्थ और व्यवस्थित समाज में ही वह क्षमताएं विकसित होती हैं।

यह अच्छी बात है कि एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन के चलते हम एक शहर के स्वास्थ्य के बारे में अतिरिक्त संवेदनशील हुए हैं पर यह संवेदनशीलता न तो इसी साल खत्म होनी चाहिए न ही यहीं रुकनी चाहिए। दिल्ली ही नहीं हर छोटे शहर की सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त ध्यान देना ही चाहिए।

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