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करुणा की मूर्ति मदर टेरेसा

मदर टेरेसा की जन्मशताब्दी के अवसर पर कृपाशंकर चौबे का लेख ‘दुनिया को चाहिए कई और मदर टेरेसा’ एवं उनके जीवनीकार पूर्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला के साक्षात्कार पढ़ने को मिले। असहायों एवं गरीबों की सेवाओं के लिए मदर टेरेसा को वर्ष 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। तत्कालीन विदेश मंत्री श्यामनंदन मिश्र ने उनके सम्मान में हैदराबाद हाउस में एक भोज का आयोजन किया था। उस भोज में विदेशी राजनयिकों के अलावा देश के कई गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया था। मदर टेरेसा को जब इसका पता लगा, तो उन्होंने इतने महंगे भोज में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। उनका स्पष्ट कहना था कि जिस देश में अब भी ऐसे असंख्य गरीब लोग रहते हों, जिन्हें दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिल पाती है, उस देश में इतना महंगा भोजन वह कभी नहीं कर सकतीं। मदर टेरेसा ने विदेश मंत्रालय से निवेदन किया कि उस भोज के लिए मंगाए गए भोजन को किंग्जवे कैम्प स्थित कुष्ठ आश्रम में रहने वाले असहायों को भिजवा दिया जाए। उनके आदेशानुसार पूरा खाना उक्त आश्रम में बंटवा दिया गया था। ऐसी महान आत्मा को भुलाया नहीं जा सकता।
के. आर. पांडे, पटपड़गंज, दिल्ली

सरकारी धन की बर्बादी
पिछले अनेक वर्षो से देखा जा रहा है कि सरकारी स्तर पर जब भी वृक्षारोपण अभियान का शुभारंभ किया जाता है, तो उसमें प्रमुख अतिथि के रूप में किसी मंत्री या वरिष्ठ सरकारी अधिकारी को बुलाया जाता है। ये अतिथि महज एक पौधा लगाने की रस्म अदा करते हैं, लेकिन इन अवसरों पर उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों की पूरी फौज एकत्रित हो जाती है। जाहिर है, अतिथि के स्वागत के लिए मिठाई एवं चाय-पानी की व्यवस्था भी की जाती है और यह सब किसी की जेब से नहीं, अपितु सरकारी कोष से किया जाता है। ऐसे में, केवल एक पौधा लगाने पर हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं।
किशन लाल कर्दम, जे.जे. कॉलोनी, नई दिल्ली

सर्वेक्षण की विश्वसनीयता
हमारे चैनलों के संवाददाताओं के विपरीत बीबीसी के संवाददाता ढाबों, चाय के छोटे-छोटे होटलों या छोटे-छोटे समूहों से बात करके हवा का रुख जानने की कोशिश करते हैं। मैंने भी एक प्रयास किया। कॉमनवेल्थ गेम्स पर अपनी पार्टी के संसदीय दल की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा, ‘सरकार गड़बड़ी के आरोपों की जांच करेगी और इसमें शामिल पाए गए किसी भी व्यक्ति को आयोजन के बाद बख्शा नहीं जाएगा।’ मैंने इसे ही अपने सर्वे का आधार बनाया। मैं एक पार्क में गया, वहां पहले से मौजूद लोगों की राय इस बारे में पूछी, फिर दूसरे पार्क में गया और वहां के एक-एक व्यक्ति से पूछा। फिर तीसरे ग्रुप से पूछा। जिनसे प्रश्न किए गए, उनकी कुल संख्या 22 थी। उनमें से 18 का उत्तर था कि यह मात्र थोथा आश्वासन है। तीन ने कहा कि यदि नहीं करवाएंगी, तो उनकी साख को धक्का लगेगा। एक ने कहा कि किसी विरोधी को पीसना होगा, तो जांच करवाई जा सकती है, अन्यथा रात गई-बात गई। यदि हम स्थानीय स्तर पर ऐसे छोटे-छोटे सर्वे करें, तो हवा का रुख आसानी से पहचान सकते हैं।
सोहन सिंह भदौरिया, बीकानेर, राजस्थान

अपने गिरेबान में झांकिए
देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों बारिश के कारण जगह-जगह जलभराव और ट्रैफिक जाम की समस्या देखने को मिली। इसका पूरा ठीकरा हम सरकार के ऊपर फोड़ देते हैं, पर कभी अपने गिरेबान में झांककर देखने की कोशिश नहीं करते। जिस तरह दिल्लीवासी घर का कूड़ा-कचरा और पॉलीथीन इधर-उधर फेंक देते हैं, उससे पानी के बहने का रास्ता रुकता है। यह एक बड़ी समस्या है। इसी तरह, लोग मौका देखकर लाल बत्ती क्रॉस करने में भी पीछे नहीं रहते। परिणामस्वरूप, लंबे-लंबे जाम लगते हैं। अगर सरकार हमारी इतनी मदद कर रही है, तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि जो नियम हमारे लिए, हमारी सुख-सुविधा के लिए बनाए गए हैं, हम उनका पालन करें।
नौशाद अल्वी, जामिया मिल्लिया विश्व., नई दिल्ली

बिजली बिल का करंट
दिल्ली में रहने वाले लाखों निवासियों का बजट बिजली के तेज मीटरों से कई गुना बढ़ गया है। पहले जहां बिजली का बिल एक से दो हजार के बीच आता था, अब यह बढ़कर दो से पांच हजार के बीच आने लगा है। दिल्ली में जो नए मीटर चल रहे हैं, वे भारत के दूसरे शहरों में कहीं भी नहीं हैं। फिर दिल्ली के साथ ही ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों हो रहा है?
मान सिंह, तिलक नगर, नई दिल्ली

बेदर्द दिल्ली
देश की राजधानी के ठीक बीचोबीच स्थित शंकर मार्केट की सड़क पर, जहां से चंद मिनटों में संसद तक टहलकर जाया जा सकता है, एक गर्भवती महिला की प्रसव के बाद दर्दनाक मौत हो गई। उस पर अब खूब खबरें छापी-दिखाई जा रही हैं। चार दिनों तक वह वहां तड़पती रही, मदद मांगती रही, मगर किसी ने उस पर दया नहीं की। यह क्या दर्शाता है? हमारा समाज लगातार खुदगर्ज और बेशर्म हो रहा है। दिल्ली तो वैसे भी शासकों और शोषकों की नगरी है, उससे कोई क्या उम्मीद करे?
मान्या तोमर, सेक्टर-22, नोएडा

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