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बेदाग राजनीति

भारत के पूर्व राष्ट्रपति आर.वेंकटरमन उन राजनेताओं में से थे, जिनकी राजनैतिक शिक्षा-दीक्षा स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में हुई ओर स्वतंत्र भारत में जिन्होंने विचारवान और कर्मठ-कार्यकुशल नेता की तरह ख्याति पाई। वेंकटरमन ने राजनीति की शुरुआत मजदूर नेता और ट्रेड यूनियनों के वकील की तरह की, लेकिन उनका वैचारिक झुकाव चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की तरफ था, जो जवाहरलाल नेहरू के समाजवादी विचारों के खिलाफ थे और मुक्त उद्योग-व्यापार के समर्थक थे। वे राजाजी की स्वतंत्र पार्टी में रहे। जब वे के. कामराज के मुख्यमंत्रित्व में तब के मद्रास और अब तमिलनाडु में मंत्री हुए तो उन्होंने प्रांत के औद्योगिक विकास में बड़ी भूमिका निभाई, जिसकी बुनियाद राजा जी ने रखी थी। लेकिन वेंकटरमन को उनके राष्ट्रपति-काल से पहचाना जाएगा जिन पांच वर्षो में देश ने चार प्रधानमंत्री देखे। वे राजीव गांधी के दौर में राष्ट्रपति बनें, वी. पी. सिंह और चंद्रशेखर की सरकारं इस बीच बनीं और जब वे राष्ट्रपति पद से निवृत्त हुए तब पी. वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। जाहिर है इस उथल-पुथल और अस्थिरता के दौर में वे हमार राजनैतिक तंत्र के स्थायित्व और मजबूती के लिए फिक्रमंद रहे और उनकी इच्छा और यथासंभव कोशिश यही रही कि बार-बार सरकारं न बदलें। लेकिन इसके लिए उन्होंने अपने पद की और संविधान की मर्यादा का पूरा-पूरा ख्याल रखा। उन्हें इसके लिए ‘कॉपी बुक’ राष्ट्रपति भी कहा जाता है। यह उनकी विशेषता भी थी कि अपनी पूरी कार्यकुशलता के बावजूद वे नियमों के दायर में ही काम करते थे। वे संविधान सभा के सदस्य रहे थे और संविधान के सम्मान के प्रति बेहद जागरूक भी थे। लेकिन ऐसा नहीं था कि वे बदलती हुई राजनैतिक परिस्थितियों का आकलन नहीं कर पाते थे। वे उन लोगों में से थे, जिन्होंने बहुत शुरुआत में गठबंधन राजनीति की आहटें सुन ली थी। पढ़ाई-लिखाई से वकील और पेशे से वे राजनेता थे, साथ ही वे बेहद सुसंस्कृत व्यक्ित थे, जिनकी रुचि शास्त्रीय नृत्य और संगीत में थी। वे स्वतंत्रता संग्राम से आई राजनेताओं की पीढ़ी के लगभग आखिरी प्रतिनिधि थे।ं

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