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राजरंग

सोरन का सोरन प्रेमअपनी सरकार कहीं चली गयी है। पता नहीं घूमने-फिरने गयी है या वनवास में, लेकिन कहीं गयी है। सरकार क्या गयी, बहुतों के मन का चैन लुट गया है। कहीं मन ही नहीं लग रहा है। सरकार जितनी जल्दी लौट आयेगी, चैन और नींद भी लौट आयेगी। अब एक बार फिर इसके लिए कसरत शुरू हो रहा है। कुर्सी पर कौन बैठेगा, यह तो तय नहीं है। लेकिन मजेदार बात यह है कि जो नाम सामने आ रहा है, उसका सरनेम सोरन ही है। यानी आगे सोरन, पीछे सोरन और बीच में भी सोरन। आपको उ गाना याद होबे करगा- तितर के दो आगे तितर, तितर के दो पीछे तितर बोलो कितने तितर? वही स्टाइल में है- सोरन के दो आगे सोरन, सोरन के दो पीछे सोरन, बोलो कितने सोरन। यानी सरकार बनानेवाले सोरन। सरकार चलानेवाले सोरन और सरकार के साथ चलनेवाले सोरन। अपने सोरन जी को यदि किसी से प्यार है, तो वह भी सोरन ही हैं। यदि एसा नहीं होता तो सोरन गद्दी से हटे, तब भी सोरन ने नये कुर्सीदार के लिए सोरन को ही चुना। उनके साथी दलों ने ऑब्जेक्शन किया, तो फिर एक नहीं दो सोरन को सामने लाकर खड़ा कर दिया। इसको कहते हैं सोरन प्रेम।

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