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सरस्वती के आवरण

वसंत पंचमी। श्री पंचमी। यानी माघ मास, शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि। मौसम में परिवर्तन आता है। वसंत ऋतु मौसमी परिवर्तन का ही प्रतीक है। यही सरस्वती के आविर्भाव की तिथि मानी जाती है। इसी दिन बच्चों को विद्यारंभ कराने की भी परंपरा रही है। पुराणों के अनुसार सरस्वती ब्रह्मा की पुत्री हैं। परंतु उनकी प्रतिमा के साथ जुड़े आवरणों की व्याख्या के बिना सरस्वती के जीवन के उद्देश्य और कत्तर्व्य की अवधारणा नहीं समझी जा सकती। सरस्वती ज्ञान, कला और वाक् की देवी हैं। उनके सभी आवरण प्रतीकात्मक हैं। उनके गुण-कर्म को दर्शाते हैं। उनका हंसवाहिणी होना ही विशेष अर्थ रखता है। वु िका काम है नीर-क्षीर विवेक। मान्यता है कि हंस दूध और पानी को अलग करता है। इसलिए बौकिता की कसौटी पर खरा उतरकर ही विद्या (बुद्धि) की देवी का वाहन हंस को बनाया गया। मनुष्य से अपेक्षा रहती है कि वह नीर-क्षीर विवेक से निर्णय ले। सरस्वती के चार-हाथ हैं। चारों हाथों में वीणा (संगीत), पुस्तक (ज्ञान), कमण्डल (विज्ञान) और माला। जीवन जीन के आयामों को साधन के लिए माला जपना है। मनुष्य जीवन को सुखमय बनान के लिए संगीत, ज्ञान, विज्ञान और पद्मपात से विरक्त होन की आवश्यकता होती है। जीवन के इन चारों आयामों को हंस ही नियंत्रित करता है। माँ सरस्वती की उत्पत्ति सत्वगुण से हुई है। इनकी पूजा सफेद वस्तुओं से ही होती है। इन्हें धवल वस्त्र ही पहनाया जाता है। सुखी जीवन जीने की वु िदेने वाली सरस्वती की धूमधाम से पूजा श्रीपंचमी को होती है। हम ज्ञान-विज्ञान के पुजारी हैं। हमें धन भी चाहिए। यद्यपि धन की देवी लक्ष्मी हैं। पर विद्या धन को ही सबसे प्रधान धन माना गया है। बु िसे ही धन कमाया, खर्चा और बचाया जा सकता है। दरअसल धन कमाना, खर्चना और बचाना भी एक कला है। जिसमें बु िकी जरूरत होती है। संतोष धन भी बु िसे ही प्राप्त किया जाता है। ‘वंदेताम परमेश्वरी बुद्धि प्रदाम शारदाम्’।

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