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बयान पर बवाल

ांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने मंगलवार की प्रेस कांफ्रेंस में सरकार बनाने के सार विकल्प खुले बता कर एक तरफ गठबंधन राजनीति की हकीकत बयान कर दी है तो दूसरी तरफ पछाड़ खा रहे, कुछेक सहयोगी दलों को नाराज भी कर दिया है। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की तारीफ और जयललिता व वाममोर्चा से समर्थन की उम्मीद जता कर जहां राहुल गांधी ने अभी भी संप्रग के साथ चल रहे लालू प्रसाद और रामविलास पासवान को भड़कने और बयान देने को मजबूर कर दिया, वहीं वाममोर्चा जसे कट्टर शत्रु के करीब आने की संभावना जताकर ममता बनर्जी के लिए आंखे तररने की स्थिति पैदा कर दी है। उधर तमिलनाडु में सोनिया गांधी की रैली रद्द किए जाने पर कांग्रेस द्रमुक संबंधों पर तमाम आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। हालांकि वीरप्पा मोइली से लेकर अश्विनी कुमार तक कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता उनके इस बयान पर सहयोगी दलों को समझाने और शांत करने में जुट गए हैं और शायद शांत कर भी लिया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि राहुल गांधी ने चुनाव के बाद दिए जाने वाले इस रणनीतिक बयान को चुनाव के पहले क्यों दिया? क्या यह समझदारी भरा बयान था या जल्दबाजी में दिया गया नासमझी भरा बयान? मूलत: इस बयान का अर्थ है कि कांग्रेस भाजपा के अलावा किसी और पार्टी को प्रतिपक्षी पार्टी नहीं मानती। कमोबेश यही स्थिति भाजपा की भी है बस फर्क इतना है कि उसे वाममोर्चा का समर्थन कभी हासिल नहीं हो सकता। इसलिए सार विकल्प खुले रखने की बात कह कर राहुल गांधी यही बताना भी चाहते थे कि कांग्रेस के पास सरकार बनाने के लिए भाजपा से ज्यादा विकल्प खुले हैं और वाममोर्चा कांग्रेस का वैसा दुश्मन नहीं है जसा कि भाजपा का। इस बयान के माध्यम से राहुल गांधी सरकार के निर्माण में अपनी बढ़ती रणनीतिक भूमिका को तो रखांकित कर ही रहे थे साथ ही भाजपा और राजग के उस प्रचार की हवा भी निकाल रहे थे जो उसने तीसर चरण के मतदान के बाद बड़े जोर-शोर से चला रखा है। ढुलमुल मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए चल रहे भाजपा के दावे को खारिा कर राहुल गांधी ने कांग्रेस का दावा मजबूत कर दिया है। इस बयान का तात्कालिक तौर पर इतना ही मतलब है। आगे की स्थितियां जसा कि प्रियंका गांधी ने इशारा किया है कि 16 मई के चुनाव परिणाम तय करंगे।

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