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असली चुनौती है चुनाव बाद की

हम बीच बदलाव के हैं। बस एक हफ्ता और, उसके बाद चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और सरकार बनाने की कवायद शुरू हो जाएगी। फिलहाल तो ऐसा कोई संकेत नजर नहीं आ रहा कि ये नतीजे किधर जाएंगे। बेशक जब तक यह होगा कानाफूसी भी चलेगी और बदलाव की आशाएं-आशंकाएं भी। और फिर नतीजा चाहे जो भी हो सत्ता के समीकरण और उसका स्वरूप पूरी तरह से बदल जाएगा। ज्यादातर क्षेत्रीय और राजनैतिक दलों ने विभिन्न सामाजिक और आर्थिक मसलों पर अपना रुख घोषणापत्र में बता दिया है। इसलिए अब साझा सहमतियां या साझा एजेंडा बनाना होगा, कुछ ऐसा जिस पर समीकरण में शामिल सभी दलों की सहमति हो। अगर संप्रग सत्ता में आया तो एक नया न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनेगा और अगर भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनी तो नेशनल एजेंडे को नई शक्ल देनी होगी। तीसर मोर्चे की संभावना कम है, लेकिन अगर उसने सरकार बनाई तो उसका अपना कार्यक्रम होगा। इस सब को लेकर आर्थिक योजनाविदों, उद्योगपतियों और विदेशी निवेशकों सबके मन में अनिश्चितता है। इसलिए यह जरूरी है कि प्रमुख आर्थिक और सामाजिक मसलों पर आम सहमतियों को देखा जाए। इसमें मुझे जो महत्वपूर्ण तत्व दिखाई देते हैं वे इस तरह हैं - सबसे पहले तो सबसे जरूरी है आर्थिक विकास की तेजी को बहाल किया जाए। कांग्रेस नए आर्थिक प्रोत्साहन पैकेा देने को तैयार है, वह मानती है कि उसकी पहले के तीन पैकेा से मंदी को कुछ हद तक थामने में कामयाबी मिली है। अभी यह देखा जाना शेष है कि अर्थव्यवस्था में तो थोड़ी बहुत मजबूती बहाल हुई है वह स्थायी है या तात्कालिक। खासतौर पर इसलिए कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को अभी मंदी से मुक्ित में कोई पुख्ता कामयाबी मिलती नहीं दिख रही। आर्थिक तेजी को बहाल करने की भाजपा की सोच थोड़ी अलग है। उसका जोर आर्थिक और वित्तीय नीति में ऐसे नए कदम उठाने पर है, जिससे तेजी फिर से जोर पकड़ सके। सरकार किसी की भी बने सभी के लिए यह जरूरी होगा कि वे ऐसी रणनीति बनाएं, जिससे निर्यात में फिर से तेजी आए और पूंजी का प्रवाह फिर से शुरू हो। सभी राजनैतिक दल यह कोशिश करंगे कि मंदी की वजह से नौकरियों को होने वाला नुकसान कम हो और रोजगार के नए अवसर सामने आएं। ऐसी छिटपुट रपटें जरूर हैं कि छंटनी जसे कामों में कमी आई है, लेकिन रोगार के नए अवसर पैदा होने की खबरं नहीं आ रहीं। निर्यातक निराश हैं, क्योंकि उन्हें निर्यात बाजार में तुरंत कोई भला होता नहीं दिख रहा। भारत से होने वाला निर्यात श्रम प्रधान होता है। इसलिए निर्यात बाजार में जब तक कुछ अच्छा नहीं होता है, बड़े पैमाने पर हुई छंटनी की भरपाई किसी भी तरह से नहीं हो सकेगी। इस चिंता से निपटने के लिए रणनीति सभी दलों को बनानी होगी। नगदी धन की उपलब्धता और उधार की लागत ऐसा मसला है, जिस पर बहस बनी ही रहेगी। भाजपा शायद ब्याज दर में बड़ी कटौती की नीति को ही पसंद कर, जबकि कांग्रेस उत्तरोत्तर सुधार वाले तरीके को पसंद करगी। सभी पार्टियां कम से कम फिलहाल तो तेज आर्थिक सुधार चलाने के संकल्प को दरकिनार कर देंगी, कम से कम तबतक के लिए जबतक अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी पर न आ जाए। कोई भी राजनैतिक दल बाजार पर से नियंत्रण तबतक ढीला नहीं करना चाहेगा, जबतक विकास और रोगार की दर काफी आगे न बढ़ जाए। बाजार की नाकामी से उपभोक्ता को बचाने के तरीके सभी पार्टियां अपनाना चाहेंगी। दूसर नंबर की आम सहमति इस बिंदु पर होगी कि केंद्र व राज्यों की वित्तीय हालत को बहाल करने पर सभी दलों का जोर रहेगा। वित्तीय घाटे, चालू खाते के घाटे और मुद्रास्फीति की भावी चिंताओं से अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल दबाव में हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय खासकर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष यह चाहता है कि जीडीपी का दो फीसदी अतिरिक्त धन वित्तीय प्रोत्साहन पर खर्च किया जाए। लेकिन भारत की जो वित्तीय स्थिति है, उसमें इस तरह से धन खर्च करने की संभावना काफी कम है। सभी राजनैतिक दल सार्वजनिक प्रावधान और सार्वजनिक खर्च को बढ़ाना चाहेंगे। इसलिए अगले साल हमें भारी खर्च दिखाई देगा, इसके नतीजे भले ही जो भी हों। सरकार की वित्तीय हालत सुधारने का काम प्राथमिकता सूची में काफी नीचे रहेगा। लेकिन यह सब कुछ समय के लिए ही होगा। बाद में सभी दल ऐसी रणनीति बनाना चाहेंगे, जिससे वित्तीय हालात में सुधार हो। तीसरा मसला विदेश नीति का है। कांग्रेस अमेरिका और जी-7 के देशों से रिश्ते बनाए रखना चाहेगी। भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में कोई फेरबदल नहीं होगा, बल्कि इसे तुरंत लागू करने की कोशिश होगी। भाजपा सरकार भी इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सकेगी, भले ही कुछ दिखावटी बदलाव जरूर कर ले। पाकिस्तान, उसके तालिबानीकरण और वहां सक्रिय आतंकवादी संगठनों पर दोनों ही दलों को मौजूदा नीति पर ही चलना होगा। चौथा मुद्दा है आंतरिक सुरक्षा का। कांग्रेस संसद के पिछले सत्र में पास हुए कानून को मजबूत करने की कोशिश करगी, जबकि भाजपा पोटा जसे कानून को फिर से लागू करना चाहेगी। सभी पार्टियां पुलिस प्रशासन को मजबूत बनाकर नक्सलवाद जसी समस्या पर लगाम लगाना चाहेंगी। पांचवा मसला है विकास में सबको समाहित करने का। सभी दल इसके लिए ग्रामीण रोगार गारंटी योजना, भारत निर्माण योजना और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना जसे कदम उठाना चाहेंगी। भाजपा सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास पर ज्यादा ध्यान देना चाहेगी। ऐसे योजना को लागू करना भाजपा की प्राथमिकता में सबसे ऊपर है। इसी तरह का ही मामला इनफॉरमेशन तकनीक और ब्राडबैंड को गांवों तक पहुंचाने का भी है। चुनाव अब खत्म हो रहा है इसलिए गठबंधन के सहयोगियों में आपसी सहमतियां बनाना अब सबसे जरूरी काम है। यह कभी भी आसान नहीं होता। विवाद के मसलों को काफी सतर्कता से निपटाना पड़ता है। लेकिन राष्ट्रीय महत्व के कुछ मसलों पर सभी दल अगर सहमत हों और यह उनकी प्राथमिकता में आ जाए तो यह देश के लिए अच्छा रहेगा। सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर हमें एक कॉमन एजेंडे की जरूरत है। ठ्ठड्डठ्ठस्र्ह्व ञ्च ठ्ठद्मह्यन्ठ्ठद्दद्ध.ष्oद्व लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं।

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