DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

फौलादी इरादों का रिटायरमेंट प्लॉन

आयरन मैन रतन टाटा मुक्ति चाहते हैं। जब वे साठ साल के हुए थे तब उन्होंने टाटा समूह के मुखिया पद से मुक्ति चाही थी। नहीं मिली। सत्तर के हुए तो भी उन्होंने मुक्ति के लिए जोर लगाया लेकिन उनकी नहीं चली। रतन टाटा जैसी शख्सियत कभी बूढ़ी नहीं होती है। हर दिन का अनुभव उन्हें और जवान और ऊर्जावान बनाता है। 1991 में जब टाटा समूह की कमान संभाली थी तो उन्होंने कहा था कि मैं यहां से व्हील चेयर पर नहीं जाना चाहूंगा।

अब वे टाटा समूह को और मोहलत नहीं देना चाहते हैं। दो साल में वे पूरे 75 के हो जायेंगे। नए मुखिया की खोज के लिए उसने एक समिति बना दी है। मुंबई के एक पुराने पारसी परिवार में 28 दिसम्बर 1937 में जन्मे रतन को बचपन में उनकी दादी नवाजबाई ने पाला। वे सात वर्ष के थे तो उनके पिता नवल होरमस जी टाटा और मां सूनु अलग हो गए। शुरुआती पढ़ाई मुंबई के कैथ्रेडल और जॉन कोनून स्कूल में हुई।

न्यूयार्क की कारनेल यूनिवर्सिटी से 1962 में आर्किटेक्चर और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में 1962 में ग्रेजुएशन किया। इसी साल उन्हें आईबीएम से नौकरी का ऑफर मिला। लेकिन जेआरडी टाटा की सलाह पर उन्होंने टाटा समूह में काम करने का फैसला किया। जेआरडी ने सबसे पहले टाटा समूह की बीमार कंपनी नेल्को उन्हें सौंपी। 

रतन ने अपने विजन से कुछ ही समय में कंपनी को लाभ की स्थिति में पहुंचा दिया। यहीं से शुरू हुई विजय यात्रा टाटा समूह के चेयरमैन पद पर जा कर रुकी। विचारों से परम्परावादी और सौम्य दिखने वाले रतन टाटा की रणनीति आक्रामक कभी नहीं दिखी। लेकिन कोरस के टेकओवर ने उनके अंदर छिपी हमलावर क्षमता को लोगों के सामने ला दिया। अपने से छह गुना बड़ी कंपनी के टेकओवर के इतने बोल्ड फैसले के पीछे आखिर क्या था?

रतन बताते हैं कि आंखों में सपने हों और हौसले बुलंद हों तो आसमान छूने के लिए पर लग ही जाते हैं। देश की अपनी कार बनाने के लिए उन्होंने सबसे बड़ा जुआ खेला। उसमें भी वे सफल रहे। उन्होंने देश को जनता कार लखटकिया नैनो भी दी। टाटा समूह ने साल्ट से सॉफ्टवेयर की बुलंदियां उनके ही नेतृत्व में हासिल की हैं। 

उन्होंने टाटा फाउन्डेशन की स्थापना की। इसके जरिए देश में अनेक सामाजिक विकास संबंधी कार्य किए जा रहे हैं। उनका औद्योगिक साम्राज्य पूरी तरह से भारतीय मूल्यों पर आधारित है। हर संकट में इस घराने ने आगे बढ़ कर मदद की है। 1988 में नमक के संकट की अफवाहों के दौरान रतन टाटा ने अखबारों में विज्ञापन देकर देशवासियों को आश्वस्त किया था कि वे नमक की कमी नहीं होने देंगे।

वे कार में ड्राइवर की बगल वाली सीट में ही बैठते हैं। पार्टी-वार्टी से उनकी तौबा है। अविवाहित होने के कारण वे कभी-कभी अकेला भी महसूस करते हैं। वे जमशेदपुर में टाटा स्टील में मजदूरों के साथ भी काम कर चुके हैं। भारत सरकार उन्हें पद्म भूषण से नवाज चुकी है। असल में वे हैं भारत रत्न।    

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:फौलादी इरादों का रिटायरमेंट प्लॉन