DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अंग्रेजो! आओ भारत आओ

अंग्रेजो! आओ भारत आओ

जिन दिनों ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत हो रही थी तब भारत में बहुत से लोग कह रहे थे कि यह भारत के एक बार फिर से गुलाम होने की शुरुआत है, क्योंकि विदेशी पूंजी आएगी तो बहुत सी अलामतें अपने साथ लाएगी। लेकिन पूंजी जब आती है तो अपने साथ रोजगार, खुशहाली और ग्रोथ भी लाती है। वे यह भी भूल गए थे कि संचार क्रांति के इस दौर में भारत जैसे विशाल देश को कोई गुलाम नहीं बना सकता, न ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की तुलना आज के मल्टी नेशनल कारपोरेशंस से की जा सकती है। ईस्ट इंडिया कम्पनी का एक देश था मगर इन कारपोरेशंस का उस तरह से कोई देश नहीं है। मुनाफा ही इनके लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर है। ये कम्पनियां जहां जाती हैं वहां के उपभोक्ता को ध्यान में रखकर अपने उत्पाद तैयार करती हैं। ये लोकल कम्पनियों को तगड़ी टक्कर देती हैं। इससे इन कम्पनियों को भी बदलना पड़ता है और अधिक उपभोक्ता फ्रेंडली होना पड़ता है। वैसे भी पुरानी कहावत है कि पैसा ही पैसे को खींचता है। आप के पास संसाधन होंगे, पूंजी की वापसी की गारंटी होगी, तभी कोई इन्वेस्ट कर सकता है।

हैदराबाद, गुड़गांव, बेंगलुरु, चेन्नई और बड़ी संख्या में गांव के बदलते चेहरे इस बात का प्रमाण हैं कि आज का भारत वैसा नहीं है जिसे दीन-हीन समझा जाता था, जिसे बाहर के लोग सभ्यता का पाठ पढ़ाने की कोशिश करते थे। ऐसा उस समय के तमाम लेखकों के साहित्य में  भी दिखता है। आज का भारत वह तरुण भारत है जिसमें हम ही नहीं दुनिया सम्भावना देख रही है। कहा तो यही जा रहा है कि चीन बूढ़ा हो रहा है और भारत जवान। इसकी 55 प्रतिशत युवा जेनरेशन में वह दमखम है कि  वह इस देश की न केवल पूरी तस्वीर, बल्कि तकदीर ही बदल सकती है। या यों कहें कि तकदीर बदल ही गई है। भारतीय सबीर भाटिया से लेकर आम मध्य वर्ग के डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स ने विदेशों में रहकर इतना पैसा कमाया है और भारत को भेजा है कि विदेशी मुद्रा के भंडार भरे पड़े हैं।

एक जमाने में पहाड़ के लोग जब मैदानी इलाकों में आते थे तो वहां से अपने गांवों में मनीऑर्डर भेजते थे। इसे मनीऑर्डर इकानॉमी कहा जाता था। मनीआर्डर से प्राप्त पैसों ने गांव का हुलिया ही बदल दिया था। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बारे में कहा जाता है कि वे अपने देश और विरासत को अकसर ही नहीं भूलते। वे अपने देश और संस्कृति से जुड़े रहना चाहते हैं। इसीलिए जहां रहते हैं वहां मिनी भारत बना लेते हैं। पहले यहां पश्चिम की तरह पैसों की या मनमाफिक जॉब्स की सुविधा नहीं थी, लेकिन जब से यहां ये सुविधाएं बढ़ी हैं तब से बहुत लोग भारत वापस भी आ रहे हैं। इन एनआरआई ने भारत की न केवल तस्वीर बदली है, बल्कि जहां इनकी संख्या अधिक है उन देशों में इनको ध्यान में रखकर नीतियां बनाई जाने लगी हैं। जिस भारत को गरीबी और अंधेरे से भरा माना जाता था, उसकी काबिलियत के परचम को देखकर अमेरिका में यह बात चल निकली है कि मांएं अपने बच्चों से कहती हैं कि जल्दी अपना होमवर्क कर ले वरना कोई इंडियन आ जाएगा। अमेरिका, यूरोप में लोग यह देखकर परेशान हैं कि जिस मंदी से वे कराह उठे उसका सामना भारत ने किस सफलता से किया । इसका श्रेय भारत के लोगों की बचत की आदत को दिया जा सकता है। जहां बड़े से बड़े और छोटे से छोटे जॉब के बावजूद लोग अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा बुरे वक्त का सामना करने के लिए बचाते हैं।

यह एक उभरते ताकतवर देश की कथा ही है कि ओबामा और बॉन की मून को नमस्ते कहना पड़ता है। ओबामा अपने यहां के छात्रों को गांधी को फॉलो करने को कहते हैं।

विदेशों में लोग हिंदी सीख रहे हैं। सिर्फ हिंदी ही नहीं दूसरी भाषाओं को भी महत्व मिल रहा है। इस लेखिका ने पिछले वर्ष यूरोप की सबसे ऊंची चोटी युंग फ्रो पर हिंदी में लिखा देखा था- अपनी सेवा स्वयं करें। नीचे लिखा था- चिकन सैंडविच और वेजी टेबल सैंडविच। यही नहीं जिनेवा का सबसे बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर है- मनोर । वहां एक बहुत बड़ी गणेश जी की मूर्ति लगी है।  जिनेवा में इम्मीग्रेशन अफसर ने पासपोर्ट चैक करने के बाद उसे लौटाते हुए बहुत मुसकराते हुए नमस्ते कहा था। अन्यथा जिनेवा में फ्रेंच को लेकर इतना ईगो है कि वहां एयरपोर्ट पर जब एक अधिकारी से अंगरेजी में एक सवाल पूछा गया था तो उसने सिर हिलाते हुए कहा था- नो इंग्लिश। फ्रांस में यदि कोई स्त्री साड़ी पहनकर या बिंदी लगाकर जा रही है तो लोग दूर से ही ‘इंडियन इंडियन’ कहकर पुकारने लगते हैं। आज भारत के लोग बड़े उपभोक्ता की हैसियत से उन्हें दीख रहे हैं, जिन्हें अपने उत्पाद को बेचना है। इसके अलावा भारत की कार्यकुशलता और पश्चिम के मुकाबले बहुत सस्ती श्रमशक्ति का इस्तेमाल भी करना है, लेकिन भारत सिर्फ खरीदार नहीं है वह अपने उत्पादों को बेचता भी है। क्योंकि यदि आप सिर्फ खरीदेंगे और बेचेंगे कुछ नहीं तो कर्ज के भारी बोझ तले दब जाएंगे। डाबर जैसी कम्पनी 60 देशों में अपने उत्पाद बेचती है।

जिन लोगों ने भारत की ताकत को बढ़ाया है उसमें प्रोफेशल तबका जैसे इंजीनियर साइंटिस्ट, डाक्टर्स, मैनेजर्स, आई टी, उद्योग सेक्टर के मध्यवर्ग के लोग हैं।

यह वही मध्यवर्ग है जिसे आम तौर पर अपनी निष्क्रियता के लिए आलोचना झेलनी पड़ती है। लेकिन ध्यान से देखें तो यही वह वर्ग है जो सबसे अधिक चलायमान और चंचल है। इसी को पवन वर्मा ने ‘द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास’ कहा है। ओबामा ने भी कहा था कि भारत में मध्य वर्ग पूरे अमेरिका की आबादी जितना बड़ा है। यही मध्य वर्ग है जो सिर्फ देशी ही नहीं विदेशी कम्पनियों को लुभा रहा है क्योंकि इसी के पास पूंजी है यही उपभोक्ता और खरीददार भी है। इसके अलावा भारत की वर्ल्डवाइड स्वीकृति में हिन्दी फिल्मों, टेलिविजन सीरियल्स तथा नेट की बड़ी भूमिका है। हिंदी फिल्मों ने भारत की उस छवि को तोड़ा है जो आम तौर पर उसे गरीब अनपढ़ और बेचारे देश की तरह दिखाती है। नरगिस दत्त ने सत्यजित रे की फिल्मों तक पर यह आरोप लगाया था कि वह भारत की गरीबी को विदेशों में बेचते हैं। भारत साधुओं, संपेरों, लालटेन से अलग हटकर एक विकसित देश है ऐसा सब मानने लगे हैं। ठीक है बहुत सी समस्याएं हैं, पर वे कहां नहीं हैं। यही कारण है कि हॉलीवुड तथा अन्य देशों के एक्टर्स बॉलीवुड में काम करना चाहते हैं। बड़ी संख्या में एक्टर आ भी पहुंचे हैं। शाहरुख खान का नाम हाल ही में भारत यात्रा पर आए डेविड कैमरन तक लेते हैं। पहले हमारे फिल्म निर्माताओं में विदेशों में फिल्म शूट करने की होड़ लगी रहती थी, मगर अब विदेशी फिल्म निर्माता यहां लोकेशंस ढूंढ़ने आते हैं।

कल तक अच्छे इलाज के नाम पर लोग विदेशों में इलाज कराने जाते थे मगर आज विदेशों से बड़ी संख्या में लोग यहां इलाज कराने आ रहे हैं। मेडिकल टूरिज्म की तरफ देखें तो भारत में पश्चिमी स्टैंडर्ड के हिसाब से अच्छी और अत्याधुनिक सुविधाएं हैं। एम्ब्रयानिक स्टेम सेल रिसर्च पर जार्ज बुश ने रोक लगा दी थी। उस वक्त कैलिफोर्निया में मशहूर फिल्म अभिनेता श्वाजर्नेगर ने इसके खिलाफ अभियान चलाया था। अब हाल ही में अमेरिका ने इस रिसर्च के क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति दे दी है। एक तरह से अमेरिका में स्टेम सेल रिसर्च अपने शैशवकाल में है, जबकि भारत में स्टेम सेल रिसर्च जोरों पर है। इसका करोबार अरबों रुपए तक जा पहुंचा है। न्यू मेडिवर्ल्ड की गीता श्रॉफ एम्ब्रयानिक स्टेम सेल के जरिए बहुत से रोगियों को ठीक कर चुकी हैं। इनमें अजित जोगी भी शामिल हैं। स्टेमसेल से इलाज करने में भारत के बहुत से अस्पताल और वैज्ञानिक नई-नई खोजें कर रहे हैं। इसके अलावा हृदय रोगों से लेकर विभिन्न अंगों के ट्रांसप्लांट तक की सुविधा भारत में उपलब्ध है। यह विदेशों से बहुत सस्ती भी है इसलिए पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे बहुत से एशियाई देशों के अलावा अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी के लोग भी यहां इलाज कराने आ रहे हैं। सड़कों की ओर देखिए तो बड़ी संख्या में एक से एक उम्दा कारें दौड़ रही हैं। इनमें देशी और विदेशी दोनों कारें हैं। विदेश की कई कम्पनियां तो अपनी कारों को अपने देश के मुकाबले हमारे यहां ज्यादा बेच रही हैं। 
मोबाइल क्रांति तो हिंदुस्तान में हर जगह हो चुकी है। इससे आपस में कम्युनिकेशन और सूचना लेने-देने का काम तो बढा़ ही है, विदेशों से संचार भी बढ़ा है। पहले कोई विदेश जाता था तो ऐसा लगता था जैसे काला पानी हो गया हो, मगर अब मोबाइल, मेल, वेबकैम ने इन दूरियों को घटा दिया है। यह दूरी सिर्फ हमारे लिए ही नहीं विदेशियों के लिए भी घटी है। वे भारत की तरफ सिर्फ टूरिस्ट की हैसियत से ही नहीं, रोजगार पाने के लिए भी देख रहे हैं। वे डॉलर, पौंड, यूरो या येन में नहीं, रुपयों में सेलरी मांग रहे हैं। इसके लिए वे भारतीय रहन-सहन के तौर-तरीके ही नहीं, यहां की भाषाएं भी सीख रहे हैं। सर्च इंजन्स गूगल, रेडिफ, याहू आदि ने इसे बहुत पहले ही समझ लिया था, इसीलिए उन पर अधिकांश भारतीय भाषाएं उपलब्ध हैं।
रुपए का सिम्बल बन जाने से भारत भी इलीट देशों में शामिल हो चुका है। कोई कारण तो है कि टोनी ब्लेयर की पत्नी साड़ी पहनती हैं। हॉलीवुड की अभिनेत्रियां भी यदा-कदा साड़ी पहनी नजर आती हैं। कई विदेशी कम्पनियां भारतीय ड्रेस कोड को भी अपना रही हैं। अपने यहां विशेष अवसरों पर लड़कियों को साड़ी पहनने के लिए कहती हैं।

दिल्ली मेट्रो को देखने और मैनेजमेंट तकनीक सीखने के लिए जापान, हांगकांग आदि से प्रतिनिधिमंडल आ रहे हैं कि आखिर हम इतनी भीड़ को इतने कम दामों में इतनी आधुनिक और अच्छी सुविधा कैसे मुहैया करा रहे हैं, क्योंकि विदेशों में जो मेट्रो या ट्यूब ट्रेन चलती हैं, वे बहुत महंगी हैं। उनमें इतने यात्री भी नहीं होते।

वैज्ञानिक प्रगति के मामले में भी देखिए कि अब न केवल हम अपने सेटेलाइट छोड़ रहे हैं बल्कि दूसरे देश भी हमसे अपने सेटेलाइट छुड़वा रहे हैं। इससे हमें भारी आय भी हो रही होगी। एक समय जब हमें हैवी वाटर देने से मना कर दिया गया था या क्रायोजेनिक इंजन नहीं दिए गए थे, तो हमारी स्थिति बहुत दीन-हीन हो गई थी। सिर्फ अंतरिक्ष कार्यक्रम ही क्यों अब व्यापार के मामले में हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं। मैनेजमेंट कन्सल्टेंसी से जुड़े मृत्युंजय कहते हैं- भारतीय विदेशी कम्पनियां खरीद रहे हैं। विदेशी भारतीय कम्पनियों में निवेश कर रहे हैं।

बहुत से अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब अमेरिका और यूरोप के दिन लद चुके हैं। आने वाले दिनों में दुनिया में भारत, चीन और ब्राजील मेजर प्लेयर होंगे। एक्जीक्यूटिव सर्च कम्पनी इगोन जेंडर इंटरनेशनल के प्रेसीडेंट जॉन जे ग्रम्बर का कहना है कि अमेरिका में तो भारतीय कम्पनियों की मौजूदगी पहले से थी, मगर यूरोप में अब फील की जा रही है। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की यात्रा और उनका बदला हुआ व्यवहार यह बता रहा है। वरना यही ब्रिटेन था जो पाकिस्तान के मुकाबले हमेशा हिन्दुस्तान को दोषी ठहराते हुए कश्मीर का राग अलापता रहता था।

पश्चिम को एनालाइज करते हुए जॉन जे ग्रम्बर कहते हैं- चीन के मुकाबले भारतीय एंग्लो अमेरिकन कल्चर से अधिक वाकिफ हैं। पूरे भारत के बारे में दुनिया में बहस छिड़ी है। भारतीयों ने अमेरिकन्स के इस भ्रम को तोड़ दिया है कि सिर्फ वे ही बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियों के चीफ बन सकते हैं। भारतीय कम्पनियां बहुत दिनों से पश्चिमी देशों में काम कर रही हैं इसलिए उन्हें वहां के तौर-तरीके पता हैं। लक्ष्मी मित्तल और टाटा इसीलिए पश्चिम के मीडिया में बहुत अधिक कवरेज पाते हैं।

भारत की तेज ग्रोथ है कि विदेशी कम्पनियां भारत को ललचाई नजरों से देख रही हैं। यहां की कम्पनियों को खरीद रही हैं। उनमें बड़ी संख्या में निवेश कर रही हैं। विदेश के लोग सिर्फ दिल्ली ही नहीं एनसीआर तथा अन्य शहरों में नौकरी कर रहे हैं। वे भारत की अपने देश से कम से कम चालीस गुनी कम महंगाई से भी बहुत खुश हैं।

ईस्ट इंडिया कम्पनी चार सौ साल पुरानी है। उसके पंजे से भारत को आजाद हुए सिर्फ छह दशक हुए हैं, लेकिन उसकी उड़ान ऊंची और ऊंची हो रही है। विदेशी यहां आएं और देखें कि दुनिया के नक्शे पर यह देश कहां खड़ा है। आईटी सेक्टर में देखिए कि भारत के पास नारायण मूर्ति, अजीम प्रेमजी, सबीर भाटिया आदि न जाने कितने नाम हैं, जबकि अमरीका के पास तो दिखाने को सिर्फ बिल गेटस ही हैं।

इस अगस्त के महीने में, 9 अगस्त को भारत छोड़ो को जब हम याद करते हैं और कहते हैं कि अंग्रेजों भारत छोड़ो, तो क्यों न हम कहें- अंग्रेजों भारत आओ और देखो कि हम कहां से कहां जा पहुंचे। सब आएं और भारत की तरक्की के रास्ते में अपना हाथ बढाएं।

हमारा लोहा दुनिया माने

भारतीय ब्रांड और कम्पनियां: जो विदेशों में लोकप्रिय हैं- बिरला, टाटा, रिलाइंस, एयरटेल, डा. रेड्डीज लैब, रैनबैक्सी, सत्यम, विप्रो। इनकी ब्राड वैल्यू-ट्रस्ट, क्वालिटी, इमेज, प्रॉमिजेज।

फिर सोने की चिड़िया

कैसे विदेशी कम्पनियां भारतीय उपभोक्ता को नजर में रखकर काम करती हैं इसे वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के उदाहरण से अच्छी तरह देखा जा सकता है। काउंसिल सोने का व्यापार बढ़ाना चाहती थी। इसके लिए उसने अक्षय तृतीया पर्व का सहारा लिया। इस पर्व को इस तरह से प्रचारित किया गया कि इस दिन सोना खरीदने से घर में लक्ष्मी आती है। इसी कैम्पेन का नतीजा था कि पिछले कुछ सालों में अक्षय तृतीया के दिन सोने की बिक्री काफी बढ़ जाती है।

दूर देशों तक हमारी धाक

आज कम्पनियां एक तरह का व्यवसाय नहीं करतीं। बिरलाओं की सैकड़ों कम्पनियों का साम्राज्य सिर्फ भारत में नहीं दूर-दूर तक देश-विदेश में फैला है। टाटा के पास स्टील से लेकर कम्युनिकेशन और मोबाइल तक का बड़ी कम्पनियां हैं।

इसी तरह रिलायंस, भारती एयरटेल, महिन्द्रा आदि मशहूर भारतीय कम्पनियां हैं। ये कम्पनियां इन दिनों विदेशी कम्पनियों को खरीदकर अपने पांव पसार रही हैं।

फिल्में देशी, अदाकार विदेशी

कैटरीना कैफ (इंग्लैंड) बूम, सरकार सिंह इज किंग, राजनीति, अजब प्रेम की गजब कहानी आदि

रचैल शैली (इंग्लैंड) लगान

एंटोनियो बरनाथ (इंग्लैंड) किसना

हाजेल (इंग्लैंड) पहला-पहला प्यार

याना सिन्कोवा (चैक) योगी

इलेने हमान (दक्षिण अफ्रीका) रोग

निगार खान (नार्वे) हैलो, कौन है

ब्रांडे रोड्रिक्स (अमेरिका) आउट ऑफ कंट्रोल

टाटा यंग (थाईलैंड) धूम

तानिया जेटा (आस्ट्रेलिया) बंटी और बबली

बारबरा मोरी (उरुग्वे) काइट्स

भारत आकर नृत्य-संगीत सीख रहे

ऐलगिना और विक्टर (रोमानिया) भरतनाटयम

हालविंग- सितार

इसाबेला अन्ना (फ्रांस) कथक

किम (कोरिया) कथक

निकोलीना निकोलस (क्रोशिया) भरतनाट्यम

मशहूर लेखक भगवती चरण वर्मा ने अपनी मशहूर कहानी ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’ में मजाकिया ढंग से भारत में अंग्रेजों की सत्ता के कोलकाता से दिल्ली तक आ पहुंचने की कहानी कही है। लेकिन यदि इस कथा को हम उलट लें तो आज भारत के साम्राज्य का यह तम्बू विदेशों में फैलता जा रहा है। जिस ईस्ट इंडिया कम्पनी को गुमान था कि उसका सूरज कभी नहीं डूबता है, उसे चार सौ वर्ष बाद एक भारतीय संजीव मेहता ने खरीदा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:अंग्रेजो! आओ भारत आओ