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नेपाल में प्रधानमंत्री चुनाव की विफलता के लिए भारत पर आरोप

नेपाल में प्रधानमंत्री पद के लिए हुए चौथे चक्र के चुनाव की विफलता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया गया है। शुक्रवार को हुए चुनाव के पूर्व भारत के विशेष दूत श्याम सरन का काठमांडू दौरा विवादों में आ गया है।

प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल को इस्तीफा दिए एक महीने से अधिक हो चुका है, लेकिन नए प्रधानमंत्री के चुनाव की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही है।

शुक्रवार के चुनाव में चकित करने वाली बात यह हुई कि माओवादियों के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल प्रचंड 6०1 सदस्यीय सदन में मात्र 213 सांसदों का ही समर्थन हासिल कर पाए। जबकि इसके पहले तीसरे चक्र के चुनाव में प्रचंड को 259 वोट प्राप्त हुए थे।

यह स्थिति कुछ हद तक इसलिए भी पैदा हुई, क्योंकि सांसदों को इस चुनाव में विश्वास नहीं था और दो बड़ी पार्टियां चारों चक्र के चुनाव के दौरान निरपेक्ष बनी रहीं। परिणामस्वरूप कोई भी उम्मीदवार सरकार बनाने के लिए जरूरी 3०1 सदस्यों के समर्थन का जादुई आंकड़ा नहीं हासिल कर सका।

उप प्रधानमंत्री बिजय कुमार घछाधर, पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्री शरद सिंह भंडारी और अन्य मंत्री व सांसद मतदान के लिए देर से पहुंचे और उन्हें वहां प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।

कुल 6०1 सांसदों में से मात्र 468 प्रचंड को वोट देने के लिए उपस्थित हुए, लेकिन उनमें से 156 ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया और 99 ने प्रचंड के खिलाफ मतदान किया।

प्रचंड के प्रतिद्वंद्वी, पूर्व उप प्रधानमंत्री राम चंद्र पौडेल के लिए मतदान के समय संसद में 561 सांसद उपस्थित थे। लेकिन उन्हें मात्र 122 वोट ही प्राप्त हुए। 245 सांसदों ने उनके खिलाफ मतदान किया और 149 सांसदों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार को अपने विशेष दूत के रूप में पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन को पार्टियों के बीच मध्यस्थता करने के लिए नेपाल भेजा था।

माओवादियों, गैर माओवादियों और मीडिया के एक वर्ग द्वारा सरन के इस दौरे को माओवादियों की स्थिति को कमजोर करने के लिए बताया जा रहा है।

यद्यपि काठमांडू पहुंचने के बाद सरन ने कहा था कि भारत चुनाव में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन कांतिपुर दैनिक ने शुक्रवार को खबर दी है कि सरन ने एक ऐसी सरकार के गठन पर जोर दिया, जिसमें माओवादी शामिल भले हों, लेकिन नेतृत्व उनके हाथों में न हो।

दैनिक नया पत्रिका ने कहा है कि सरन ने तराई की पार्टियों से कहा कि प्रचंड को वोट न दें ताकि शुक्रवार को भी चुनाव विफल रह जाए। जबकि दैनिक रिपब्लिक ने आश्चर्य व्यक्त किया है कि नेपाल में पूर्व भारतीय राजदूत सरन को क्यों भेजा गया था।

सबसे तीखी आलोचना नेपाली टाइम्स साप्ताहिक ने की है। उसने अपने संपादकीय में लिखा है, ''भारतीय हुक्मरानों ने नेपाली माओवादियों के साथ उसी तरह का व्यवहार किया है, जिस तरह उन्होंने 199० में तमिल लड़ाकों के साथ किया था। दिल्ली माओवादियों को न केवल नेपाल में लोकतंत्र के लिए खतरे के रूप में देखता है, बल्कि भारत में भी। लिहाजा भारत माओवादी पार्टी को काठमांडू में सत्ता पर काबिज होते नहीं देखना चाहता।''

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