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हल होगी अपराधीकरण की पहेली

बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब मिलने वाला है। इस बार यह साबित हो जाएगा कि राजनीति के अपराधीकरण के लिए जनता यानी मतदाता जिम्मेदार है या विभिन्न दलों के नेता। अब तक जनता नेता को, और नेता मतदाता को इसके लिए जिम्मेदार मानते रहे हैं। हालांकि निष्पक्ष प्रेक्षकों की यह राय रही है कि इसके लिए अधिकतर मामलों में कुछ प्रमुख नेता ही जिम्मेदार हैं। पर अब नतीजे पर पहुंचने का मौका आ गया है। यह मौका बिहार का अगला चुनाव देने जा रहा है। बिहार उन कुछ राज्यों में शामिल है जो राजनीति के अपराधीकरण के लिए चर्चित रहे हैं।

बिहार से ही चुने गये दो परस्पर-विरोधी बाहुबली सांसदों ने जब लोकसभा में ही आपस में मारपीट कर ली थी तो इस घटना से मर्माहत संसद ने विशेष अधिवेशन बुलाया। 1997 के उस अधिवेशन में राजनीति के अपराधीकरण पर गहरी चिंता प्रकट की गई। फिर संसद ने सर्वसम्मत संकल्प किया कि ‘राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने और भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय अभियान चलाया जाएगा।’ इस संकल्प को दूसरे ही दिन भुला दिया गया। पर बिहार में हाल के वर्षो में राजनीति के अपराधीकरण की समस्या में काफी कमी आई है। ऐसा मौजूदा राज्य सरकार व न्यायपालिका द्वारा कुछ ठोस उपाय किए जाने के कारण ही हुआ है। अगला चुनाव इन उपायों को अंजाम तक पहुंचाने का अवसर बन सकता है।

यह स्थिति पहली बार पैदा हुई है कि एक चुनाव में ही सब कुछ साबित हो जाए। गत विधानसभा चुनाव में बाहुबली हिंसा के तहत किसी की मौत नहीं हुई थी। वह हिंसामुक्त चुनाव नवंबर 2005 में हुआ था। पर उससे पहले जब फरवरी 2005 में राज्य विधान सभा के चुनाव हुए थे तो चुनावी हिंसा में तब बिहार में 27 लोगों की जाने गई थीं। याद रहे कि फरवरी 2005 में एक मंत्रिमंडल कार्यरत था और नवंबर 2005 में राष्ट्रपति शासन था।
एक और बात देखने को मिली। नवंबर 2005 के चुनाव में उससे पहले के चुनावों की अपेक्षा कम बाहुबली विजयी हो पाये। सन 2009 के लोकसभा के आम चुनाव में भी बिहार में कोई बाहुबली-प्रेरित हत्या नहीं हुई। कुछ नक्सल प्रेरित हत्याएं जरूर हुई। वह भी पहले की अपेक्षा काफी कम। सन 2009 के लोक सभा चुनाव में भी 2005 के विधानसभा चुनाव की अपेक्षा कम बाहुबली चुनाव जीत पाये। यानी बिहार की राजनीति का अपराधीकरण कुछ और कम हुआ। यानी गत दो आम चुनावों में चुनावी हिंसा लगभग नहीं के बराबर हुई। सन 2005 के नवंबर में तो बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बल तैनात था, पर 2009 में तो अधिकतर मतदान केंद्रों को होम गार्ड के जवानों के ही हवाले छोड़ दिया गया था। फिर भी बाहुबली, चुनावी हत्या करने की हिम्मत नहीं जुटा सके। यह भी महत्वपूर्ण बात है कि सन 2005 और 2009 में जब जनता को भयमुक्त वातावरण में मतदान करने का मौका मिला तो उन्होंने राज्य के अधिकतर वैसे बाहुबलियों को भी अपने मतों के जरिए हरा दिया जो गत कई चुनावों से लगातार जीतते आ रहे थे। यानी आम मतदाताओं के लिए बाहुबली जरूरी नहीं हैं यदि कानून अपना काम करने लगे। याद रहे कि अदालतों ने गत करीब चार साल में लगभग 49 हजार अपराधियों को सजा सुना दी है। भयमुक्त माहौल बनाने में इन अदालती निर्णयों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे पहले एक नेता ने कहा था कि हम किसी बाघ के खिलाफ बकरी को तो चुनाव मैदान में खड़ा नहीं कर सकते। पर जनता ने बाघों को भी पराजित कर दिया।
पहले बिहार के कई बाहुबलियों को यह लगता था कि चाहे वे जहां भी और जिसकी भी हत्या कर दें,कुछ राजनीतिक शक्तियां उन्हें अंतत: बचा ही लेगी। पर अब ऐसी स्थिति नहीं है। कानून अपना काम कर रहा है, इसलिए मतदान केंद्रों पर हिसां व जोर-जबर्दस्ती करने वाले बाहुबलियों की काफी कमी होती जा रही है। विधानसभा का अगला आम चुनाव अक्टूबर-नवंबर में होने वाला है। यदि गत दो चुनावों की तरह इस बार भी शासन व चुनाव आयोग ने मतदाताओं को भयमुक्त माहौल प्रदान किया तो बचे-खुचे बाहुबली भी बिहार की विधायिका से बाहर हो जाएंगे।
जनता का रुख देख कर तो यही लगता है। इन अनुभवों को झुठलाते हुए कुछ दलों के नेता अब भी ‘डाकुओं को वाल्मीकि’ बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। वे अब भी यह समझते हैं कि बाहुबलियों को टिकट देना जरूरी है। यदि खूंखार बाहुबली इस बीच सजायाफ्ता हो चुके हैं तो कुछ खास क्षेत्रों से चुनाव जीतने के लिए उन बाहुबलियों के करीबी रिश्तेदारों को टिकट देना जरूरी है। क्या बिहार के बदले राजनीतिक माहौल में अब भी यह करना जरूरी हैं?
जनता तो अच्छे चरित्र के उम्मीदवार चाहती है। ये तो दल व उसके नेतागण हैं जो जनता के लिए यह स्थिति पैदा कर देते हैं कि दो बुरे में से ही किसी एक को आप चुनिए। उम्मीद यही है कि आम जनता इस बार बचे-खुचे बाहुबलियों को राजनीति से बाहर कर देगी। ऐसा सचमुच हो गया तो लोग यह अंतिम तौर से देख लेंगे कि किस तरह जनता नहीं बल्कि कुछ सत्ताकामी स्वार्थी और माफियापक्षी नेतागण ही बिहार की राजनीति के अपराधीकरण के लिए जिम्मेदार रहे है।
बिहार में जब पहली बार राजनीति का अपराधीकरण शुरू हुआ था तब भी उसके लिए तब के सत्ता पक्ष के कुछ स्वार्थी नेता ही जिम्मेदार थे। उन्होंने स्थानीय थानों और अंचल कार्यालयों को घूसखोरी व अन्याय का अड्डा बनने दिया। जब जनता को थानों व अंचल कार्यालयों से न्याय नहीं मिलने लगा तो वह स्थानीय बाहुबलियों की शरण में जाने के लिए मजबूर हो गई। बाहुबलियों को तब सत्ता का संरक्षण था। वे बाहुबली कम से कम एक तरफ के लोगों को न्याय देने लगे। उससे माफियाओं की ताकत बढ़ी। फिर कुछ बड़े दलों के खास नेताओं ने टिकट देकर उन्हें विधायक व सांसद बना दिया। टिकट दे देने से किसी बाहुबली को उस दल का वोट बैंक भी हासिल हो जाता है। अब जब कानून का शासन भरसक स्थापित हो रहा है तो होना यह चाहिए था कि सारे दलों के नेतागण राज्य के भले के लिए अब बाहुबलियों को भूल जाते। यदि चुनाव आयोग व शासन इस बार भी शांतिप्रिय मतदाताओं का साथ दे दे तो इस चुनाव में सचमुच रहे-सहे बाहुबलियों व माफियाओं का भी राजनीति से सफाया होकर ही रहेगा और अपराध का पक्ष लेने वाले नेताओं की हार होगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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