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केदारनाथ में शिव शिलारूप

ऋषिकेश से कीर्ति नगर और फिर गुप्तकाशी के पास फाटा पहुंचे। गुप्तकाशी से थोड़ा आगे गौरीकुण्ड से 14 किलोमीटर कठिन चढ़ाई क रके केदारनाथ पहुंचना होता है।
केदारनाथ मन्दिर में भीड़ तथा अव्यवस्था थी जैसी हमारे मन्दिरों में होती है। श्रद्धालु, पंडे, पुजारी सभी धक्का-मुक्की कर रहे थे, इसी में हमने भी दर्शन किये। बिल्वपत्र से केदारनाथ में भगवान् शिव को अर्पण किया। एक तिकोनी शिला के रूप में यहाँ भगवान् शिव विराजमान हैं। कहा जाता है कि पाण्डव जब हिमालय की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो भगवान् शिव एक बैल का रूप धरकर इस पहाड़ पर अन्य पशुओं में छिपने का प्रयास किया, भीमसेन ने भगवान् शिव को वृषभ के रूप में भी पहचान लिया और उनको पकड़ने का प्रयास करने लगे, शिवजी धरती में समा गये, उनके सिर और सींग पशुपतिनाथ (नेपाल) में निकले, और उनके पैर जम्मू-कश्मीर में सीमावर्ती पुंछ क्षेत्र में निकले, पुंछ में बूढ़ा शिव करके एक मन्दिर में पूजा अर्चना अभी भी होती है। भीम का हाथ वृषभरूप शिव की पीठ पर पड़ा था वही हिस्सा एक तिकोनी शिला के रूप में केदारनाथ मन्दिर में पूजा जाता है।
शिवजी के धरती में समा जाने की स्थानीय कथा और भी है। शिवजी जब पृथ्वी में समाये तो उनके हाथ जिस जगह निकले उसे तुंगनाथ कहते हैं, जहाँ शिवजी का मुख निकला वह जगह रुद्रनाथ कहलाती है। कल्पनाथ में भगवान् शिव के जटाओं का पूजन होता है। मद्यमहेश्वर में अन्य अंगों का पूजन होता है। केदारनाथ, मद्यमहेश्वर, तुंगनाथ, कल्पेश्वर और रुद्रनाथ ये पंच केदार कहलाते हैं। केदारनाथ का मन्दिर पाण्डवों ने बनवाया था जिसके अब भग्नावशेष ही बाकी है। वर्तमान मंदिर शंकराचार्यजी ने लगभग 800 वर्ष पूर्व बनवाया था। इस मन्दिर के बाहर नन्दी की एक बहुत भव्य प्रतिमा है। मन्दिर के अन्दर गर्भगृह में तिकोनी शिला के रूप में भगवान् शिव विराजमान हैं। यह मन्दिर समुद्र तल से 3553 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। मन्दिर अक्षय तृतीया को खुलता है, जो आमतौर पर अप्रैल के अन्त या मई के शुरू में होती है, और भाईदूज को (अक्टूबर/नवम्बर में) बन्द हो जाता है। भगवान् केदारनाथ की पालकी गुप्तकाशी के नजदीक उखिमठ में ले जायी जाती है। केदारनाथ मन्दिर के पास ही आदिगुरु शंकराचार्य जी की समाधि भी स्थापित है। मन्दिर के पास यात्रियों के रहने की अच्छी व्यवस्था है और एक छोटा सा बाजार भी है।

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