अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

महात्मा गांधी पर एक खुला विश्वविद्यालय

पिछले कई साल से मोहनदास करमचंद गांधी पर मेरे जो प्रमुख अध्यापक हैं वे संयोग से उनके पोते भी हैं। गांधी अगर उनके दादा हैं तो सी. राजगोपालाचारी उनके नाना, वे दोनों की ही याद और विरासत का काफी सम्मान करते हैं। गोपाल गांधी ने श्रीलंका के चाय बागान की पृष्ठभूमि पर अंग्रेजी में एक बहुत ही सुंदर उपन्यास रिफ्यूजी लिखा है। इसके अलावा उन्होंने विक्रम सेठ के भारी भरकम उपन्यास ‘ए स्यूटेबल ब्वॉय’ का हिंदी में अनुवाद भी किया है। इसके अलावा उन्होंने लंदन के काफी प्रभाशाली नेहरू केंद्र की भी स्थापना की है। वे दक्षिण अफ्रीका में प्रेरणाप्रद उच्चायुक्त की भूमिका भी निभा चुके हैं। और जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के शब्दों में वे ‘पश्चिम बंगाल के काफी लोकप्रिय राज्यपाल भी हैं’। अपने इन साहित्यिक और सार्वजनिक दायित्वों के बीच ही उन्होंने आधुनिक भारतीय इतिहास और खासकर स्वतंत्रता आंदोलन की खासी अच्छी समझ भी विकसित की है। वे मेरा विकीपीडिया भी हैं। विकीपीडिया की तरह उनका ज्ञान हमेशा ही बिना किसी फीस के उपलब्ध रहता है, लेकिन विकीपीडिया के विपरीत वे कोई गलती नहीं करते। अगर उनके जसा विलक्षण और उदार शख्स मेरा मित्र न होता तो इस कॉलम में कहीं ज्यादा गलतियां करता। गोपल गांधी से अपनी पहली मुलाकात के कुछ ही समय बाद मुझे न्यूयॉर्क जाना पड़ा। उनका सुझाव था कि अपनी रुचि के मुताबिक मुझे वहां एनुगा एस. रड्डी से मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि रड्डी दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आंदोलन की बहुत बड़ी हस्ती थे। न्यूयॉर्क की सर्दियों की एक ठंडी अंधेरी शाम मैं इस लंबे और मृदु़भाषी सज्जन से मिलने जा पहुंचा। वे बीस साल से संयुक्त राष्ट्र के रंगभेद विरोधी सेंटर के निदेशक थे। उस समय वे कोशिश कर रहे थे कि पश्चिम के देश अपने को दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी शासन से अलग कर लें। इसके लिए अपील कर रहे थे, सम्मेलनों का आयोजन कर रहे थे, नेताओं के साथ लॉबिंग कर रहे थे और निर्वासित दक्षिण अफ्रीकियों के मेजबान थे। 1में जब हम मिलें तो यह लड़ाई लगभग जीत ही ली गई थी। मांडेला जेल से बाहर थे। अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस यानी एएनसी से पाबंदी हट चुकी थी। और पहले लोकतांत्रिक चुनाव की तैयारियां चल रही थीं। दक्षिण अफ्रीका के प्रगतिशील लोग उनका काफी सम्मान करते थे और अभी भी करते हैं। एएनसी के कई बड़े नेता भी उन्हें अपना दोस्त मानते थे, और कई छोटे कार्यकर्ता भी। हाल ही में मैं एक ऐसे नौजवान से मिला जो प्रिटोरिया में संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर में काम करता था। जब मैंने रड्डी का नाम लिया तो वह तुरंत ही खड़ा हो गया। उस शख्स के सम्मान में, जिसके पास उसे पिता और चाचा अपने निर्वासन काल में गए थे और बाद में वह भी एक आजाद दक्षिण अफ्रीकी के रूप में उनसे मिला था। जब वे 10 के आस-पास संयुक्त राष्ट्र से रिटायर हुए तो उन्होंने गंभीरता से गांधी में दिलचस्पी लेनी शुरू की। उनके लिए यह एक तरह से घर वापसी जसा ही था। वे आंध्र प्रदेश के एक गांधीवादी परिवार में पैदा हुए थे। उन्होंने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पुस्तकालयों से गांधी पर दुर्लभ सामग्री जुटानी शुरू की। बाद में वे अपनी इस खोज को दक्षिण अफ्रीका के पुस्तकालयों तक ले गए। पिछले बीस साल में ई. एस. रड्डी ने गांधी पर तकरीबन हाारों पेज की ऐसी सामग्री जमा कर ली है, जिनमें बहुत सी ऐसी चिट्ठियां भी हैं, जो गांधी वांग्मय में नहीं आ सकी थीं। इसके अलावा गांधी की वकालत की प्रैक्िटस के रिकॉर्ड भी हैं, उनकी गतिविधियों के बार में सरकार की रपटें भी। उनके इंटरव्यू जो फ्रेंच, जर्मन और अंग्रेजी वगैरह भाषाओं में छापे गए थे। इसके बाद उन्होंने बड़ी उदारता से अपने इस काम की प्रतियां भारत, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के अभिलेखागार को सौंप दीं। इसी बीच उन्होंने अमेरीकियों, दक्षिण अफ्रीकियों और यूरोपीय लोगों से गांधी के रिश्तों पर कई किताबें लिखीं। गोपाल गांधी ई. एस. रड्डी को ‘गांधी भंडार’ कहते हैं, ‘महात्मा गांधी पर एक मुक्त विश्वविद्यालय’। उनकी उदारता ही अपने आप में बहुत बड़ी चीज है, उतनी ही बड़ी है उनकी ऊरा। 82 साल की उम्र में वे दिल्ली आए और देश के सबसे बड़े गड़बड़झाले- संपूर्ण गांधी वांग्मय का मानक संस्करण निकालने में भारत सरकार की मदद की। एक साल बाद मैं उनसे येल विश्वविद्यालय में मिला। वे वहां दक्षिण अफ्रीका पर नई सामग्री को जमा कराने आए थे और न्यूयॉर्क वापसी की ट्रेन पकड़ने जा रहे थे। दुनिया के कई बड़े संस्थानों को उनकी भलमनसाहत और प्रज्ञा का लाभ मिला, और बहुत से आम लोगों को भी। अक्सर ही मुझे उनकी ई-मेल मिलती है, जिसके साथ ही गांधी पर कुछ ऐसी सामग्री होती, जो मैंने कभी पहले नहीं देखी होती। भारत और भारतीयों के अलावा रड्डी ने उस महाद्वीप को भी बहुत कुछ दिया, जिसे उन्होंने अपना घर बना लिया था। इंटरनेट पर सर्फ करते हुए मुझे एक वेबसाइट222. ड्डद्यह्वद्मड्ड.orद्द पर उनका काम दिखाई दिया। यह अफ्रीका पर विद्यतापूर्ण संसाधनों की एक डिाीटल लाईब्रेरी है। सितंबर 2007 में न्यूयॉर्क के एक रस्तरां में उन्होंने इस वेबसाइट की प्रतिनिधि एंजेलीक महल को खाने पर आमंत्रित किया। बाद में उसने अपने ब्लॉग पर लिखा, ‘मैं कल उन्हें उनकी एक किताब वापस करना चाहती थी, उन्होंने कहा कि मैं इसे अपने पास ही रखूं और पढ़ती रहूं। पिछले कुछ महीनों में हमने साथ-साथ काम किया है। इसी दौरान एक बार मैंने यह जिक्र किया था कि मैं पहले बुरकीना फासो में रहती थी और वहां काम करती थी, और कल वे मेर लिए बुरकीना फासो पर फाईनेंशियल टाइम्स का रिपोर्ट खंड लेकर आए। उन्होंने इसके साथ ही गांधी के भाषणों की एक किताब भी दी, जिसका संपादन उन्होंने खुद ही किया था। इस पर लिखा था- मेरी दोस्त एंजेलीक के लिए, ई. एस.। वे परियोजना में सिर्फ मेर सहयोगी ही नहीं हैं, वे मेर दोस्त भी बन गए हैं और मेर गुरु तो वे हैं ही।’और उनका यही रिश्ता इस लेखक के साथ भी है। गोपाल गांधी के मुझ पर कई उपकार हैं, लेकिन उनमें सबसे बड़ा उपकार यही है कि उन्होंने मेरा परिचय ई. एस. रड्डी से करवाया। लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: महात्मा गांधी पर एक खुला विश्वविद्यालय