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टीवी निर्माताओं को समझाना मुश्किल काम है : अमित झा

टीवी निर्माताओं को समझाना मुश्किल काम है : अमित झा

कलर्स के धारावाहिक ‘भाग्य विधाता’, ‘बैरी पिया’ के लेखक और इमेजिन के धारावाहिक ‘सर्व गुण संपन्न’ के गीतकार अमित कुमार झा अपनी सहज-स्वाभाविक लेखन शैली से दर्शकों के दिलों में उतरते जा रहे हैं। ‘कुड़ियों का है जमाना’ और कई भोजपुरी फिल्मों का संवाद लिख चुके अमित अब बिहार के अपराध पर भी एक फिल्म लिख रहे हैं। पेश है सत्य सिंधु से उनकी बातचीत के मुख्य अंश।

आजकल किन-किन धारावाहिकों और फिल्मों पर काम चल रहा है?

फिलहाल कलर्स के लिए ‘भाग्य विधाता’ लिख रहा हूं। सहारा वन पर आने वाले एक शो ‘बिट्ट’ के डायलॉग्स भी लिख रहा हूं। बालाजी का धारावाहिक है ‘सर्वगुण संपन्न’, जिसके गाने मैंने ही लिखे हैं। नए धारावाहिक के लिए बहुत प्रस्ताव आ रहे हैं, लेकिन इन कार्यों का दबाव इतना अधिक है कि नए काम स्वीकार करना उचित नहीं लगता।

कहा जा रहा है कि टीवी पर आज भावनाओं का कारोबार हो रहा है। क्या आप सहमत हैं?

भावनाओं का कारोबार हो तो रहा है और आगे भी होता रहेगा। दरअसल, फिल्म और टीवी एक माध्यम के रूप में हमेशा से कारोबारी ही रहा है और वो भी भावनाओं का कारोबारी। आप ही बताएं कि ऐसा कौन सा समय रहा है जब विजुअल मीडिया ने भावनाओं का कारोबार नहीं किया हो। इस माध्यम की जो जरूरतें हैं, वे कारोबार से ही पूरी होती हैं। इसी कारोबार के बीच से कुछ अच्छे उत्पाद बनाने होंगे, कुछ अच्छी चीजें निकाल कर लाने की जरूरत है। इसी कारोबार के बीच से कलर्स ने ‘बालिका वधु’ और ‘भाग्य विधाता’ जैसे धारावाहिक दिए हैं, जिन्होंने कई बड़े मिथक तोड़े हैं।

क्या फिल्म और टीवी आज अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पा रहे हैं?

फिल्में अब बिल्कुल सही दिशा में रफ्तार पकड़ चुकी हैं। आप देखिएगा अगले दस सालों में नए लोग भारतीय सिनेमा को पलट कर रख देंगे। फिल्म और टीवी के ऊपर जिम्मेदारियों का जो बोझ है, उनमें सबसे अहम बात यह है कि क्या फिल्म महज एक मनोरंजन है। इसी सवाल का जवाब नए जिम्मेदार लोग ढूंढ़ते रहते हैं। और इन्हीं सवालों का जवाब है ‘ए वेडनसडे’, ‘उड़ान’, ‘पीपली लाइव’ या ऐसी अन्य फिल्में। आप यह भी देखिए कि जो पहले से स्थापित सुपरस्टार थे या फिल्म निर्देशक थे, वे भी कहीं न कहीं अब अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं। शाहरुख खान को क्या जरूरत थी ‘चक दे इंडिया’ या ‘स्वदेश’ बनाने की। ‘माई नेम इज खान’ से करण जाैहर जैसे फिल्ममेकर की जो छवि हमारे सामने आई है, वह चौकाने वाली है। दरअसल अब जिम्मेदार हुए बिना यहां एडजस्ट करना थोड़ा मुश्किल भी हो रहा है।

और टीवी में?

टीवी में रफ्तार धीमी है, ऐसा मैं कह सकता हूं। ऐसा भी नहीं है कि टीवी में जिम्मेदारी भरा काम नहीं हो रहा, लेकिन टीवी कार्यक्रमों के प्रोडय़ूसर्स को समझा पाना बड़ा मुश्किल होता है। हम लोग इस समस्या का सामना कर रहे हैं। हाल में शुरू किए गए धारावाहिकों पर अगर गौर करें तो ज्यादातर महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाली कहानियां हैं। मैं महिला प्रधान कहानियों का विरोधी नहीं हूं, लेकिन इंडस्ट्री को भेड़चाल से बचना चाहिए। उदय प्रकाश की एक कहानी है ‘मोहनदास’। इस पर बेहतरीन धारावाहिक बन सकता है और वह धारावाहिक आज के समाज को ताकतवर ढंग से अभिव्यक्त कर सकता है। साहित्य में उस कहानी की जो अभिव्यक्ति हुई है टीवी में उसे विस्तार मिल सकता है। लेकिन उसके लिए प्रोडय़ूसर को तैयार करना आसान नहीं।

अपनी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के बारे में बताएं।

मैं अपनी तरह का एक अलग सिनेमा देना चाहता हूं। एक फीचर फिल्म के लिए रिसर्च का काम पूरा करने के बाद अब एक स्क्रीन प्ले का काम शुरू किया है। इसे मैं खुद ही अपने बैनर तले बनाने की योजना बना रहा हूं, क्योंकि ऐसी कहानी के लिए दूसरे निर्माता को तैयार करना आसान काम नहीं। सब ठीक रहा तो देखिएगा कि बिहार का जो पूरा आपराधिक वातावरण है, उसकी एक मजबूत अभिव्यक्ति साबित होगी यह फिल्म। लोग बिहार के कुछ अलग तरह के अपराधों के बारे में जान कर चौंक जाएंगे।

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