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प्रणब के जवाब से असंतुष्ट लालू का सदन से वाकआउट

प्रणब के जवाब से असंतुष्ट लालू का सदन से वाकआउट

बैंक ऋण नहीं लौटाने वाले कारोबारी रानों और कंपनियों का नाम उजागर करने की मांग को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा अस्वीकार किए जाने से असंतुष्ट राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद सदन से वाकआउट कर गए।

बैंकों की गैर निष्पादनकारी आस्तियों पर पूरक प्रश्न पूछते हुए लालू ने कहा कि मैं विद्वान मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि क्या सरकार को इसकी जानकारी है कि बड़े कारोबारी घराने और कंपनियां बैंकों से अरबों रुपए का ऋण प्राप्त करती हैं और उसे नहीं चुकाती हैं। फिर नए नाम से नई कंपनी बना कर दोबारा ऋण प्राप्त कर लेती हैं, जबकि विद्यार्थियों, किसानों और माधयम वर्ग के लोगों को आसान ऋण नहीं मिल रहा है।

उनहोंने जानना चाहा कि क्या सरकार बैंक ऋण नहीं चुकाने वाले कारोबारी घरानों, बड़ी कंपनियों आदि का नाम जाहिर करेगी। पूरक प्रश्न का उत्तर देते हुए मुखर्जी ने कहा कि मुझे इस बात की जानकारी है कि बिहार तथा पूर्व के कुछ राज्यों में ऋण जमा अनुपात राष्ट्रीय अनुपात से कम है। इस विषय पर मैंने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा की है।

उन्होंने कहा कि भारत के लिए बैंकिंग संस्थाएं कोई नई बात नहीं है। बैंकों का संचालन कुछ निर्धारित नियमों एवं मानदंडों के तहत होता है। भारत में बैंकिंग प्रणाली सुदृढ़ है, जो प्रबंधन के बुनियादी नियम और सिद्धांतों के तहत कार्य कर रही है। प्रणब ने कहा कि मैं लालू जी के सुझाव को स्वीकार नहीं कर सकता हूं। वित्त मंत्री के जवाब से असंतुषट लालू ने कहा कि मैं जवाब से संतुषट नहीं हूं। मैं वापस जा रहा हूं।

माकपा के वासुदेव आचार्य ने सार्वजनिक क्षेत्र (पीएसयू) के बैंकों की गैर निष्पादनकारी आस्तियों (एनपीए) की मात्रा बढ़ने का उल्लेख करते हुए कहा कि मार्च 2009 में पीएसयू बैंकों की एनपीए 2.09 प्रतिशत थी जो मार्च 2010 में बढ़कर 2.27 प्रतिशत हो गई।

उन्होंने जानना चाहा कि क्या सरकार सदन के पटल पर उन लोगों का नाम रखेगी जिन्होंने पांच लाख रुपये से अधिक का ऋण नहीं लौटाया है। इनमें से कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। आचार्य के पूरक प्रश्न का उत्तर देते हुए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि गैर निष्पादनकारी आस्ति के बारे में सरकार का इरादा स्पष्ट है। सरकार सभी पुराने ऋण को वसूलना चाहती है।

उन्होंने कहा कि मार्च 2008 में पीएसयू बैंकों का एनपीए 2.34 प्रतिशत था जो मार्च 2010 में बढ़कर 2.27 प्रतिशत हुआ है। केवल निजी क्षेत्र के कुछ बैंकों का एनपीए बढ़ा है। प्रणब ने कहा कि लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि देश में 90 प्रतिशत बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के हैं।  उन्होंने कहा कि बैंकिंग कानून में गोपनीयता अधिनियम के मद्देनजर नाम उजागर नहीं किया जा सकता है।

सुमित्रा महाजन के पूरक प्रशन के उत्तर में वित्त मंत्री ने कहा कि जिस बैंक में काफी अधिक मात्रा में ऋण बकाया होता है वहां के वरिष्ठ अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। उन्होंने कहा कि लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि देश में बैंकों की 88 हजार शाखाएं हैं और जहां लाखों की संख्या में खातों का लेनदेन हो रहा हो, वहां चार-पांच हजार में कुछ त्रुटि पायी जाती है तो पूरे तंत्र को खराब नहीं करार दिया जा सकता है।

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