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जीत का दबाव बाधित करता है बच्चों का मानसिक विकास

जीत का दबाव बाधित करता है बच्चों का मानसिक विकास

जानेमाने गायक सुरेश वाडकर मानते हैं कि टीवी पर दिखाए जाने वाले टैलेंट हंट शो के जरिए प्रतिभाओं को सामने लाना ठीक है लेकिन यह भी देखना चाहिए कि बच्चों पर इन शो की वजह से कोई दबाव न पड़े वरना उनका मानसिक विकास और नैसर्गिक प्रतिभा बाधित होगी।

सुरेश वाडकर ने ईमेल के माध्यम से कहा कि हर बच्चा जीतना चाहता है और वर्तमान दौर में अभिभावकों के मन में भी चाह रहती है कि उनका बच्चा जीते और उसका नाम हो। लेकिन मैं मानता हूं कि ईश्वर हर काम के लिए समय तय करता है। अगर हम किसी काम के लिए जल्दबाजी करेंगे तो कहीं न कहीं हमें उसका खामियाज़ा उठाना पड़ेगा।

वह कहते हैं कि यही बात बच्चों के मामले में होती है। जीतने की चाहत और प्रतियोगिता का दबाव इतना अधिक होता है कि बच्चों का मानसिक विकास और उनकी नैसर्गिक प्रतिभा पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।

सुरेश वाडकर कहते हैं कि ऐसे बच्चें बाद में आगे नहीं बढ़ पाते। बेहतर होगा कि बच्चों को उनका बचपन जीने दिया जाए। यह सच है कि प्रतिभाओं को बचपन से ही निखारना पड़ता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें गहरे दबाव में जाने दिया जाए।

कुछ टैलेंट हंट शो में स्वयं जज की भूमिका निभा चुके वाडेकर कहते हैं कि बच्चों का मन बहुत भावुक होता है और वह हार को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि वह दूसरों से पीछे रह गए। अगर यह हार उनके मन में घर कर जाए तो वह आगे किसी भी स्पर्धा में भाग लेने से घबराने लगेंगे। उनमें आई हीन भावना और कुंठा को दूर करना मुश्किल होगा।
 
वह मानते हैं कि बच्चों को बचपन से सिखाना बेहतर रहता है लेकिन स्पर्धा शब्द उनके मन में जीतने का दबाव बना देता है।

सुरेश ने वर्ष 1979 में सुर सिंगर स्पर्धा जीतने के बाद फिल्म जगत में प्रवेश किया था। इस प्रतियोगिता में संगीतकार जज थे जिनमें जयदेव भी शामिल थे। बाद में जयदेव ने उन्हें पाश्र्वगायन की पेशकश की और सुरेश ने फिल्म गमन में सीने में जलन गज़ल गाई। यह फिल्म 1978 में रिलीज़ हुई थी।

अभिनय में कोई दिलचस्पी न रखने वाले सुरेश वाडकर ने 1977 में रिलीज़ फिल्म पहेली में अभिनय भी किया था।

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