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आंध्र प्रदेश : उपचुनाव की हार-जीत के निष्कर्ष

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने 27 जुलाई को हुए 12 विधानसभा उपचुनावों में भारी जीत हासिल की। टीआरएस ने 11 सीटें जीतीं और जो भाजपा का एकमात्र उम्मीदवार जीता उसे भी टीआरएस का समर्थन हासिल था। राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। दोनों पार्टियों के कई उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गई। ऊपर से यह लग सकता है कि ये नतीजे तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के समर्थन में है लेकिन नतीजों की बारीकी से जांच करने पर मालूम होगा कि नतीजों के कई आयाम हैं और यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि तेलंगाना के पक्ष में भारी बहुमत है। ये उपचुनाव तत्कालीन विधायकों के इस्तीफे की वजह से हुए थे।

टीआरएस ने उपचुनाव में उन्हीं विधायकों को टिकट दिया और भाजपा ने भी ऐसा ही किया। यह शायद चुनाव के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि किसी एक पार्टी को शतप्रतिशत विजय मिली हो। इस विजय का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि सारे उम्मीदवारों ने अपनी जीत का अंतर भी काफी बढ़ाया है। यहां तक कि कुछ टीआरएस उम्मीदवारों ने पूर्व मुख्यमंत्री और लोकप्रिय नेता स्वर्गीय वाईएस राजशेखर रेड्डी से भी ज्यादा अंतर से जीत हासिल की।

कांग्रेस यह तर्क दे सकती है कि सचमुच उसका कोई नुकसान नहीं हुआ है क्योंकि पहले भी इनमें से कोई सीट उसके पास नहीं थी। लेकिन दो मुद्दे बताते हैं कि यह सिर्फ झूठी तसल्ली हो सकती है। पहला मुद्दा तो यह है कि वाईएसआर की मौत के बाद यह पहला चुनाव था और इन नतीजों से मौजूदा मुख्यमंत्री के. रोसैया के नेतृत्व पर शक के बादल मंडरा रहे हैं। दूसरे यह हार इस तथ्य के बावजूद हुई कि कांग्रेस और विपक्षी टीडीपी में टीआरएस को हराने के लिए गुपचुप समझौता था। पार्टी को सबसे ज्यादा अपमानजनक हार का सामना निजामाबाद शहरी चुनाव क्षेत्र में करना पड़ा जहां राज्य के कांग्रेस अध्यक्ष डी. श्रीनिवास उम्मीदवार थे। भाजपा से यह सीट हारना ज्यादा अपमानजनक है जबकि इस चुनाव क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या काफी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता ऐसे उदात्त बयान दे रहे हैं कि ‘हम अपनी हार स्वीकार करते हैं’ या ‘हम जनादेश का आदर करते हैं’ या फिर सीधे-सीधे कह रहे हैं कि लोगों ने उन्हें ही वोट दिया है जिन्होंने अपनी सीट से त्यागपत्र दिया था। आंध्र प्रदेश के प्रभारी महासचिव वीरप्पा मोइली ने ऐसा ही बयान दिया है।

टीआरएस के मुखिया के. चंद्रशेखर राव का दावा है कि ये नतीजे तेलंगाना आंदोलन के लिए स्पष्ट जनादेश हैं। यह भी जनादेश का सही मूल्यांकन नहीं है। अगर यह सच होता और चुनाव अलग राज्य के मुद्दे पर जनादेश होते तो क्या लोग ज्यादा तादाद में वोट देने नहीं निकलते। इसके उलट 27 जुलाई के चुनाव में मतदाता बहुत धीमे-धीमे और कम तादाद में बाहर निकले। मतदान के अंत में करीब 60 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया इससे अलग राज्य के पक्ष में जनभावना का तर्क कमजोर पड़ता है। टीआरएस में ही यह भय व्याप्त था कि मतदाताओं में उत्साह की कमी की वजह से उसे नुकसान हो सकता है। दरअसल, कम मतदान प्रतिशत एक गैरजरूरी चुनाव थोपने के खिलाफ मतदाताओं की उदासीनता को दिखाता है क्योंकि 2001 में अपनी स्थापना के बाद टीआरएस ने दो विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़े हैं और विरोध में त्यागपत्र देकर कई उपचुनाव जनता के सिर पर लादे हैं। टीआरएस ने अपनी चुनावी पारी कांग्रेस के साथ शुरू की थी और चुनाव दर चुनाव उसका मत प्रतिशत घटता चला गया लेकिन इस वक्त कम मतदान प्रतिशत के बावजूद उसने अपने दो मजबूत विरोधियों कांग्रेस और टीडीपी को कई जगह जमानत जब्त होने पर मजबूर कर दिया है। अगर इस जनादेश को अलग तेलंगाना के पक्ष में माना जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पर अलग राज्य बनाने के लिए दबाव बढ़ेगा। यह दबाव कुछ हद तक कांग्रेस के भीतर से ही आएगा जिसमें कई लोग यह मानते हैं कि अलग राज्य के मुद्दे पर बार-बार पीछे हटकर कांग्रेस अपनी विश्वसनीयता खो रही है। नतीजों को इस तरह भी देखा जा रहा है कि कांग्रेस को नौ दिसंबर की अलग राज्य की घोषणा से जो जनसमर्थन मिला था वह कम होता जा रहा है।

टीडीपी के नेतृत्व ने मतदाताओं का मिजाज पहले ही भांप लिया था उसने भारी प्रचार न करके हार के अपमान से बचने का तरीका अपनाया। यही वजह थी कि टीडीपी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने बाभली बांध का मुद्दा उठाया और चुनाव प्रचार से दूर रहे। इस रणनीति का कुछ फायदा हुआ और निरुत्साहित पार्टी कार्यकर्ता भी उम्मीदवारों के लिए काम करने में जुट गए।
राधा विश्वनाथ                            
radha.viswanath@gmail.com
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

 

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