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अंधों का सावन

सुना है ‘अंधों का हाथी’ लिखने से पहले शरद जोशी जी ‘अंधों का सावन’ लिखने की सोच रहे थे। नहीं लिख पाए क्यूंकि ये मेरे भाग्य में बदा था। यदि अंधे या नेत्रहीन आंखों में काजल लगा भी लें तो इसमें दोष नहीं होता। सम्राट धृतराष्ट्र तो जन्मांध थे। बगैर आँखों की मदद के वे सौ बच्चों के बाप बने। संजय के मार्फत उन्होंने न जाने कितने सावन-भादों देखे-सुने।
दृष्टिहीनों की आँखें सुना है मन में होती हैं। हमारे पास मन के नयन नहीं हैं। इसलिए हम कवि सूरदास की तरह कृष्ण की बाललीला नहीं देख सकते। श्रीकृष्ण तत्कालीन 10-20 जुलाई की रात को पैदा हुए थे। राशि से केन्सेरियन, तब लगभग सावन-भादों ही था इसी कारण मथुरा जेल के अधिकारी रात को अंधे हो गए थे ताकि वसुदेव श्रीकृष्ण को सुरक्षित ले जा सकें। इसे प्रभु की अंधी कृपा कहते हैं।
सावन में जल भराव होता है। पुराने कवि इसे जलप्लावन कहते थे। आज के युवा कवि यदि निठल्ले हों तो किसी हिमगिरी के लगभग उत्तुंग शिखर पर किसी सुरक्षित शिला की शीतल छांह खोज कर शहरों की सड़कों पर जल भराव का प्रलय प्रवाह देखने लगते हैं। पानीदार प्रणय की नई कविता का जन्म होता है और हरी-हरी कल्पना भरी-भरी लगने लगती है।
सावन में बाढ़ आते ही राहत अधिकारी अंधे होकर माल काटने लगते हैं। बाढ़ तो स्वयं अंधी होती है। राजभवनों और विधायक निवासों को छोड़कर झोपड़ियां निगलने लगती है। इन दिनों यदि कोई प्रेम में अंधा हो जाए तो प्रेमिका की ठोकरें भी घुंघरू लगने लगती हैं। सावन के अंधे और अंधों के सावन में फर्क है। इसी से तीसरा तत्व निकलता है कि अगर अंधे को अंधेरे में बड़ी दूर की सूझी तो समझो वो व्यंग्यकार है। मूर्ख बना रहा है।
उर्मिल कुमार थपलियाल

 

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