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शरीर ही तो है

वह थक गए थे। काम करते-कराते पूरा दिन निकल गया था। कुर्सी पर स्ट्रेच करते हुए सोचा कि अब शरीर ज्यादा साथ नहीं देता। एक वक्त में तो पूरी रात बीतने पर भी थकान नहीं होती थी। एक उदासी उन पर छाने लगी। डारा चैडविक का मानना है कि हम अपने शरीर को कोसने तो बहुत जल्द लगते हैं। लेकिन क्या हमने कभी उस शरीर को सराहने की कोशिश की है? यानी क्या हमने कभी माना कि इसी शरीर ने कमाल का काम किया है। चैडविक ने एक गजब की किताब लिखी है, ‘टीचिंग अवर डॉटर्स टू लव देअर बॉडीज-ईवन व्हेन वी डॉन्ट लव अवर ओन।’ यह किताब अपने शरीर को प्यार करने की वकालत करती है।
 हम अक्सर अपने शरीर को कोसते रहते हैं। अब इससे ये नहीं होता। अब इससे वह नहीं होता। लेकिन जो भी वह कर पाता है, उसके लिए कोई कृतज्ञता का भाव हमारे मन में नहीं होता। हम कुछ भी हों। इस शरीर के बिना कुछ नहीं हो सकते। इसीलिए कहा गया कि जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है। यानी इस शरीर में जो भी है, वही ब्रह्मांड में है। आपको कुछ भी करना है वह इस शरीर के बिना नहीं हो सकता। मान लो हमें दुनिया को प्यार करना है। तब पहले हमें अपने शरीर को प्यार करना होगा। हमें उसकी देखरेख पहले करनी होगी। उसे प्यार किए बिना हम किसी और को प्यार कर ही नहीं सकते।
जब हम अपने को प्यार करते हैं तब दूसरे को करने की ताकत जुटाते हैं। आखिर जो हमारे पास है ही नहीं वह हम दूसरे को कैसे दे सकते हैं। हम जब अपने शरीर को साध लेते हैं। तभी हम उसके पार जाने की सोच भी सकते हैं। अगर हम अध्यात्मिक ऊंचाई की बात करें, तो वह भी शरीर को साधे बिना मुमकिन नहीं है।

 

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