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जरदारी के इरादे

पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की यूरोप यात्रा हर तरह से विवादित और हास्यास्पद बन कर रह गई है। वे फ्रांस और फिर ब्रिटेन के दौरे पर इसलिए गए थे कि आतंकवाद के मसले पर नाटो नेताओं से साफ-साफ बात करेंगे और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन के हाल के आतंक निर्यात करने संबंधी बयान का जवाब देंगे, लेकिन वहां वे खुद ही फंसते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने फ्रांस के अखबार ला मांडे को दिए इंटरव्यू में जो बात कही है वह अमेरिका और ब्रिटेन दोनों को नागवार गुजरी है। जरदारी का यह कहना कि हम अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हार गए हैं, एक तरह की स्वीकारोक्ति भी है और एक तरह के ब्लैकमेल की धमकी भी। वे अपने इस बयान से एक तरफ यह संदेश देना चाहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में जितने संसाधन झोंके जा रहे हैं, वह पर्याप्त नहीं हैं। उसके लिए और संसाधन मिलने चाहिए। इसी के साथ वे यह भी कहना चाहते हैं कि अगर इस लड़ाई को जीतना है तो अच्छे और बुरे तालिबान का फर्क करना होगा और किसी न किसी समूह के साथ समझौता करना होगा। शायद उनका इशारा हक्कानी गुट और करजई के बीच चल रही समझौते की कोशिशों से है। लेकिन उनके इस बयान का जहां व्हाइट हाउस के प्रवक्ता राबर्ट गिब्स ने जोरदार विरोध किया है, वहीं डेविड कैमरॉन ने भी कहा है कि अगर अफगानिस्तान में कुछ लोग स्कूल जा रहे हैं, अस्पताल जा रहे हैं और अपना कारोबार कर रहे हैं तो उसका श्रेय इस लड़ाई और नाटो ताकतों को ही दिया जाना चाहिए। अब सवाल यह है कि कैमरॉन को खरी-खरी सुनाने गए जरदारी इसके बाद किस धरातल पर खड़े होकर बात करेंगे। उससे भी विचित्र स्थिति उनकी यात्रा के स्वरूप को लेकर छिड़े विवाद से बनी है। पहले कहा जा रहा था कि जरदारी की यह यात्रा महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के आमंत्रण पर होने वाली सरकारी यात्रा है। अब सवाल उठाया जा रहा है कि अगर यह सरकारी यात्रा है तो आमंत्रण के सूत्रधार उच्चयुक्त स्वयं लंदन में क्यों नहीं हैं। इसलिए आरोप लग रहे हैं कि यह एक निजी यात्रा है और विडंबना देखिए, यह ऐसे समय की जा रही है, जब पाकिस्तान में बाढ़ से भारी तबाही मची हुई है।

ब्रिटिश मीडिया ने ऐसे समय उनके यात्रा के औचित्य पर गंभीर सवाल उठाए हैं और उनकी जीवन शैली और रहन-सहन को लेकर भी टिप्पणियां की हैं। उसका कहना है कि ‘मिस्टर टेन परसेंट’ की कुल चिंता अपने बेटे बिलावल को राजनीति में लाने की है। उन्हें परेशानी झेल रही अपनी जनता की बिल्कुल चिंता नहीं है। जरदारी की इस यात्रा में न तो उनकी अपनी साख बच रही है, न ही उनके देश की। जाहिर है वे कैमरॉन की भारत यात्रा के जवाब में जो राजनय करने गए थे, उसका माहौल बिगड़ चुका है। इसलिए कैमरॉन को राजनय सिखाने गए जरदारी को खुद ही राजनय सीखने की हिदायत दी जा रही है। इन सबके बावजूद पाकिस्तान नाटो देशों का रणनीतिक सहयोगी है इसलिए उसका राजनय भीतरखाने जरूर कोई खिचड़ी पका रहा होगा। इसमें सबसे खतरनाक पहलू अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी और कश्मीर में बढ़ती हिंसा के बाद कट्टरता को बढ़ावा देने का है। इसलिए भारत को जरदारी की इस किरकिरी से निश्चिंत होने के बजाय उनके गुप्त एजेंडे पर गौर करना चाहिए।  

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